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वीरेंद्र गोयल कैसे पहुँचे फ़र्श से अर्श तक | Leaders Talk | Success Story

नमस्ते मैं हूँ रविंद्र गौतम और आप देख रहे हैं Leaders Talk, Leaders Talk में हम ऐसी शख्सियतों को लेकर आते हैं जिनका जीवन बचपन में तो बड़ा आम रहा लेकिन अब वह समाज में एक खास दर्जा रखते हैं और ऐसी ही शख्सियत आज हमारे साथ हैं वीरेंद्र गोयल जी वीरेंद्र गोयल पेशे से तो चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं लेकिन उसके साथ-साथ एक बड़े समाजसेवी हैं और इनकी संस्था समाज में बहुत सारे ऐसे लोगों के लिए काम करती जिनको आज ऐसे लोगों की आवश्यकता है.
इसके अलावा ये एक बेहतर उद्यमी भी हैं. रियल स्टेट का इनका अपना बिजनेस भी है साथ के साथ में, तो आज हम इनसे समझेंगे कि आखिर वह आम से खास कैसे हुए? और लीडरशिप की अगर हम बात करते हैं. तो क्या इनके अंदर लीडरशिप क्वालिटी है? और कैसे ये leadership quality को define करते हैं?

इन सब विषयों के ऊपर हम चर्चा करेंगे और इसका उद्देश्य सिर्फ इतना है कि जो आज की युवा पीढ़ी है वह लोगों से सीख लेकर अपने जीवन में अपनाएं और आगे बढ़ें सफल वीरेंद्र जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है

वीरेंद्र गोयल:
धन्यवाद रविंद्र जी thank you so much

रविंद्र गौतम:
वीरेंद्र जी सबसे पहला एक छोटा सा प्रश्न है कि जो आम जीवन खास जीवन में कैसे बदला क्या जब आप आम जीवन जी रहे थे क्योंकि आपने बताया कि आप एक मध्यम वर्गीय परिवार से आते हैं मैंने इंटरव्यू से पहले आपसे पूछा था कि आपने टू व्हीलर पहला कब लिया था? आपने कहा था टू व्हीलर मेरे पास तो साइकिल खरीदने के पैसे नहीं थे तो ये सब आप तो मर्सिडीज में भी सफर करते हैं और लाइन लगा रखी है गाड़ियों की ये कैसे हुआ? क्या किया?

वीरेंद्र गोयल:
रविंद्र जी मैं पहली बात तो ये मानने को तैयार नहीं हूँ कि मैं आम से खास हो गया. मैं एक वही साधारण इंसान हूँ और मुझे नहीं लगता कि मैं खास हो गया. लेकिन इस सबके पीछे एक ही चीज है कि आपने जो अपने ऊपर जिम्मेदारी ली है उसके प्रति आप sincere रहें. Honest रहें अपना कर्म करते रहें और कब आप आम से ख़ास हो जाएंगे ये आपको भी नहीं पता लगेगा. तो जहाँ तक मेरा सवाल है तो मैं तो आज भी अपने आप को एक आम इंसान ही मानता हूँ. रही बात सफलता की तो सफलता के तो बहुत से कारण होते हैं. इंसान की अपनी मेहनत होती है उसकी अपनी सोच होती है और सबसे बड़ी बात है ईश्वर की कृपा. और मैं इस बात पे ज्यादा विश्वास रखता हूँ कि मेहनत तो सब लोग करते हैं. बहुतसे लोग होते हैं. लेकिन ईश्वर की कृपा शायद हर एक पे नहीं होती और जिन पे होती है तो शायद आपको ऐसा लगता है कि वो आम से खास होगा. आम से खास हो गए.

रविंद्र गौतम:
खैर ये आपका बड़प्पन है कि आप कहते हैं कि अभी भी हम आम हैं. और जाहिर सी बात है व्यक्ति को जब आम बन के रहता है तो मैं समझता हूँ कि ज्यादा सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाता है. लेकिन मैं एक चीज यहाँ पे पूछना चाहता हूँ, वीरेंद्र जी कि जैसे आपने कहा कि बचपन आपका, आपने कहा था ना कि साइकिल लेने के भी पैसे नहीं थे. तो आपकी जो फॅमिली बैकग्राउंड है मैं थोड़ा सा उसके विषय में जानना चाहता हूँ वो सिर्फ इसलिए कि जो दर्शक आज की जो युवा पीढ़ी देखती है इस तरह के कार्यक्रमों को वह समझ सके कि ऐसा नहीं होता है कि हर व्यक्ति अगर अमीर घर में पैदा होगा तो ही वह अमीर बन सकता है. वो एक मामूली घर में भी पैदा होकर भी अमीर बन सकता है.

वीरेंद्र गोयल:
अगर ये बात है तो मैं इसका जीता-जागता example हूँ. और मेरा जन्म कानपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में थे. 1961 में मेरा जन्म हुआ. तो उस समय पिताजी एक छोटे-मोटे व्यवसाय में थे, गल्ले के काम में थे. आढ़त का काम करते थे. तो बट इतना था कि बस दो टाइम की रोटी का जुगाड़ था. लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे समय बीतता गया, हम अपनी राह पर चलते चले गए. वो कहते हैं ना कि अह मैं चलता गया और कारवां बनता गया. तो वो सफर की जब शुरुआत हुई बट उसके पीछे एक ही चीज थी. हमें ये पता था कि अगर हमें यहाँ से बाहर निकलना है इस परिस्थिति से तो उसका एक ही तरीका है कि अपने कर्म के प्रति sincere और ईमानदार काम करते रहो मेहनत करते रहो फल तो किसी के हाथ में नहीं होता हमारे पास भी नहीं था हमें तो पता ही नहीं था कि हम यहाँ तक पहुँचेंगे कैसे पहुँचेंगे लेकिन करते गए और वो रास्ते अपने आप खुलते गए. तो मैं इस बात पे बहुत फर्म बिलीव करता हूँ कि आप बहुत हालांकि हम लोग बचपन से सुनते भी आ रहे हैं, कि कर्म किए जा, फल की इच्छा मत करें, इंसान शायद मैं उसका एक example हूँ। अगर मैं ये बात कहूँ कि हम इस फल के अह कि इच्छा में हमने अपना कर्म किया कि हमें ये मिल ही जाएगा तो ऐसा उचित नहीं है। हमें एक बात पता थी कि अपना काम करते रहो, फल मिलेगा, किस रूप में मिलेगा, ये सुनिश्चित नहीं था। ये तो आज के रूप में हम देख पा रहे हैं कि हमें क्या फल मिला? तो but अपना काम करे जाओ, अपने normal course में। काम किए जाओ। चलते जाओ और रास्ते अपने आप निकलते जाओ।

रविंद्र गौतम:
आपने अभी एक वर्ड इस्तेमाल किया, sincerity. हम सफल हो जाते हैं, जब हम बड़े हो जाते हैं, जब हम संपन्न हो जाते हैं, जब हम positions पे पहुँच जाते हैं, तो ये बड़े-बड़े शब्द हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं, लेकिन जब हम युवा होते हैं। आप भी युवा रहे होंगे। कोई सीधे सीनियर नहीं बन जाते। ठीक है? तो उस दौरान का sincerity आपके अंदर थी तब क्या आप इस तरह से sincerely सोचते थे कि मुझे यह-यह काम करने हैं? और मैं जीवन के इस पायदान तक
पहुंचना चाहता हूं? कोई मंजिल आपने तय की थी? और उसे पाने के लिए आपने sincerity से अपना सफर तय किया?

वीरेंद्र गोयल:
देखिए sincerity आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है कि जब हम उस अवस्था में होते हैं तो हमें नहीं पता होता sincerity क्या होती है कैसे अर्जित की जाती है लेकिन जब हम उस journey को पूरा कर चुके होते हैं तब हम ये बात अपने अनुभव से आने वाली पीढ़ी के लिए कह सकते हैं कि अगर आप इस तरीके से करेंगे तो आप बेहतर होंगे लेकिन yes मैं भी एक आम नागरिक की तरह हमने अपना बचपन जियापन जिया और उसी तरीके से पढ़ने लिखने में कोई बहुत ज्यादा मन नहीं लगता था स्कूल जाते फिर स्कूल से हम कई बार क्लासेज कई बार क्या मतलब अक्सर क्लासेस बंद करके गुल्ली डंडा खेलना, कंचे खेलना, क्रिकेट खेलना, क्रिकेट मेरा पैशन था. हालांकि हम कभी उसमें प्रोफेशन्स ही हासिल नहीं कर पाए लेकिन क्रिकेट का एक शौक था. तो ये सब काम जो एक बचपन में और उस समय के बचपन में होते थे वो सब हमने भी किए. लेकिन वो शायद मुझे उस समय सिंसेरिटी वर्ल्ड का मतलब नहीं पता था. लेकिन एक चीज जरूर थी कि कोई काम अगर हमें टास्क दिया गया तो हमने उसको करा. शायद दिए हुए टास्क को करना ही एक sincerity थी जोकि ना जानते हुए भी हमने उसको किया। लेकिन अब चूँकि हम यात्रा कर चुके हैं तो हम कह सकते हैं कि अगर sincerity के साथ किया जाएगा तो journey बेहतर हो।

रविंद्र गौतम:
तो आपको लगता है कि अगर आपने कुछ और ज्यादा sincerity के साथ काम किया होता तो क्या जीवन आज जहाँ पे हैं उससे कुछ और बेहतर हो सकता था?

वीरेंद्र गोयल:
अह रविंद्र जी मैं ऐसा बिल्कुल नहीं मानता अपने जीवन में। ये तो एक काल्पनिक चीजें हैं कि ऐसा होता तो ऐसा हो जाता। मैं ये मानता हूँ जो हुआ है यही ईश्वर द्वारा निर्धारित था। तो के बाद फिर वही पर ही आती है कि आप अपना काम करे जाओ और आपको पता तो होता नहीं है कि उसका रिजल्ट क्या होगा लेकिन रिजल्ट आते हैं। तो इसलिए ऐसा होता मैं अगर इसको और बेहतर करता तो मेरे रिजल्ट अच्छा होते मैं ऐसा नहीं मानता।

रविंद्र गौतम:
वीरेंद्र जी जैसा आपने कहा मतलब हालांकि बात तो दार्शनिक हो गई है आप कि भई कर्म किए जाओ बाकी सब ईश्वर की कृपा से ही होना है जो कुछ होना है लेकिन हम जब भी कोई कार्य करते हैं हमारी कहीं ना कहीं कोई ना कोई expectation तो होती ही होती है। तो क्या जो कर्म किए उनके पीछे कोई एक्सपेक्टेशन नहीं थी कि मैं ये काम करूंगा तो मुझे ये हासिल हो जाएगा पहली बात दूसरा आपने कहा कि मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता था। मैं क्लासेज bunk कर लेता था। मैं गुल्ली-डंडा खेलने चला जाता था, मैं कंचे खेलने चला जाता था। तो क्लासेस bunk करने वाला व्यक्ति उसके बाद जिसका पढ़ाई में मन ना लगता हो वो chartered accountant कैसे बन गया?

वीरेंद्र गोयल:
Well अपेक्षा नहीं थी ऐसा तो कहना अह गलत होगा क्योंकि आप कोई काम करते हैं तो अपेक्षाएं तो होती हैं। और होना भी अगर हम एक नॉर्मल जीवन व्यतीत कर रहे हैं तो उसमें हम कोई भी काम करते हैं तो किसी अपेक्षा के लिए करते हैं, उसके रिजल्ट के लिए करते हैं, वो एक नॉर्मल कोर्स में है, बट उस अपेक्षा को लेकर के आशंकित हो जाना और उसको फ़्रस्ट्रेशन में लीड कर लेना, वहाँ पर मेरा क्वेश्चन है कि वो नहीं करना चाहिए। अपेक्षाएं रखेंगे, तभी हमें motivation मिलता है, काम करने का लेकिन ultimately वही है, चूँकि result अपने हाथ में नहीं है। तो अपेक्षाएं अगर हैं, लेकिन उन अपेक्षाओं को ना मिलने पर आप frustration की तरफ ना बढ़ें। ये एक बहुत बड़ी अह लर्निंग है जो मेरे अपने जीवन की नहीं है। जो मिले उसको स्वीकार कर लें। क्यों कम मिला उसके लिए बेहतरी के लिए उपाय करें। आने वाले टाइम में आपको जो चाहिए आपको मिलेगा।

और रही बात कि चार्टर्ड अकाउंटेंट कैसे बन गए? तो ये बड़ी इंटरेस्टिंग बात है कि अह दसवीं हमने उत्तर प्रदेश बोर्ड से कि हाई स्कूल जिसको बोलते हैं, तो बड़ी पीयरली हमने पास करा। किसी तरह से वो बीट के पास हो जाए। हम ग्यारहवीं में एक स्कूल बदलने की तलाश में थे ही, तो अचानक हमारे पड़ोस में एक जो बाद में हमारे एक सज्जन आए। और वो बड़े पढ़ाकू टाइप के थे। तो मैं जब उनको देखता था, पढ़ने के स्टाइल से वो जोर-जोर से बोल-बोल के पढ़ते थे, तो मैं उनकी तरफ attract हुआ, हमारी मित्रता हुई। और उस इंसान में। जो आज मुझे देख पा रहे हैं आप। उस इंसान ने मेरी जिंदगी बदली। उन्हीं के कहने पे हमें ज्ञान भारती इंटर कॉलेज में एडमिशन मिला Birhana Road पर। जो कि शायद मैं eligible नहीं था। उन्होंने अपनी गारंटी पे मेरा एडमिशन कराया, उस समय वो जाते थे, इस तरह से क्योंकि वो खुद बहुत brilliant स्टूडेंट थे। और उन्होंने हमारे और मैं आपके माध्यम से उनका शुक्रिया भी अदा करना चाहूँगा. उनका नाम है मिस्टर सुनील टंडन. और आज हम 2023 में अपनी दोस्ती के पचासवें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं और बाई चांस एक महीने पहले ही उन्होंने मुझे कॉल करके remind कराया कि we have entered into fifty years of our friendship and I became very emotional after hearing that I didn’t realize it has

उसके बाद जब एक बार आप सही ट्रैक पे आ जाते हैं तो chartered accountant बनेंगे ये भी निश्चित नहीं था मुझे तो CA का पता भी नहीं था ये भी अपने आप में एक बड़ी अलग interesting story है कि मैं कैसे चार्टर्ड अकाउंटेंट बन गया मेरा तो सपना था Advocate बनने का, अच्छा हम लोग एडवोकेट बनना चाहते थे लेकिन वो अपने मित्र की वजह से नहीं मित्र की वजह से नहीं एडवोकेट में तो ये था कि जब हमने बारहवीं पास कर ली और बड़े अच्छे मार्क्स से पास कर ली अच्छा मतलब टेंथ आपने रोपीट के किया था बारहवीं हमने उस समय मेरे शायद फिफ्टी एट पॉइंट फाइव परसेंट मार्क्स आए थे तो गुड सेकंड जीवन  में पहली बार सिक्सटी परसेंट फर्स्ट क्लास की परसेंटेज से कटऑफ होते थे तो मेरे 58.5% मार्क्स सेकंड डिवीजन से पास हुए फिर हमें लगा कि अगर जीवन में करना है तो फिर पढ़ाई करनी चाहिए. but 1977 में हमारे फादर साहब ने अह कानपुर से अपना शिफ्ट करके अ दिल्ली करा. तो चूँकि हम यूपी बोर्ड से थे तो फिर मैंने गाजियाबाद से अपनी ग्रेजुएशन पूरी करी. तो उस समय हमारे ही सपना था कि ग्रेजुएशन करके हम लॉ करेंगे। क्योंकि मैं जब भी किसी काले कोट वाले को करते हुए देखता था, सुनता था, उनके बारे में अखबारों में पढ़ता था। तो वो that used to excitement. मेरा एक आकर्षण था उसके प्रति, तो मैं एडवोकेट बनना चाहता था लेकिन किस्मत में चार्टर्ड अकाउंटेंसी लिखी हुई थी तो उसके इस पद ने chartered accountancy लिखी थी, तो उसने यहाँ पहुंचा दिया

रविंद्र गौतम:
यानी कि आपको मुजरिमों के बीच में ना पहुंचा के सेठों के बीच में, पैसे वाले लोगों के बीच में पहुंचा दिया।

वीरेंद्र गोयल:
कह सकते हैं। कह सकते हैं, हर व्यक्ति की ना बचपन में अपने युवा काल में एक तमन्ना होती है, आदर्श होते हैं, कुछ रोल मॉडल होते हैं कि मैं इस व्यक्ति की तरह अपने जीवन को जीना चाहता हूँ या ऐसा मैं बनना चाहता हूँ। जब आप अपने जीवन में आगे बढ़ रहे थे, तो क्या कभी कोई ऐसा व्यक्ति आपका रोल मॉडल बना कि मुझे अपनी लाइफ इसके जैसी जीनी है या मुझे इसके जैसे बनना है जीवन में जैसे आपने कहा कि मैं एडवोकेट बनना चाहता था जिन्हें देख-देख के बट रवि जी अह अगर कहूँ तो ऐसा कोई रोल मॉडल होगा या ऐसा मैंने कल्पना करी हमारा ध्यान कभी इस तरफ गया ही नहीं. लेकिन कहीं ना कहीं मैं अपने जीवन को जब पीछे मुड़ के देखता हूँ. तो शायद उस रोल मॉडल में मेरे फादर साहब का चरित्र उभर कर के आता है. कि जो उनकी एक never say die approach थी जीवन के प्रति. अभाव में रहते हुए भी किस प्रकार से जूझते हुए उन्होंने अपने परिवार को एकजुट रखा, उनका पालन पोषण किया जो कि उनकी जिम्मेदारी थी वो कहीं ना कहीं मुझे किसी जहन के कोने में था. और शायद उसने हमारे को मार्गदर्शन के रूप में आगे बढ़ाया. तो रोल मॉडल एस सच मैंने कभी नहीं visualize किया. लेकिन कहीं ना कहीं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पिताजी हमारे रोल मॉडल बने.

रविंद्र गौतम:
आपके रोल मॉडल बने… वीरेंद्र जी अभी हम बचपन से जवानी से और जवानी से अब हम आगे की तरफ बढ़ रहे हैं. बचपन में या जवानी में एक सपना होता है जैसे आपने कहा आप उत्तर प्रदेश से आते हैं, कानपुर से आते हैं तो जब हम कानपुर या उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर या गांव की बात करते हैं या मैं कहता हूं majority में पूरे देश में भी यही एक सोच है approach है क्योंकि लगभग 92 करोड़ लोग आज की तारीख में ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं हालांकि कानपुर कोई ग्रामीण क्षेत्र में नहीं आता है लेकिन एक सोच है एक मध्यम वर्गीय परिवार की कि भाई हमें तो बच्चा पढ़ ले बाद सरकारी नौकरी में लग जाए। तो क्या कभी आपके जीवन में ऐसा….. पिताजी हालांकि आपके व्यवसायी थे तो कभी ऐसा आपकी family में रहा कि आपको व्यवसाय करना है या नौकरी करना है? या आपकी सोच अलग थी और परिवार की सोच अलग थी?

वीरेंद्र गोयल:
सच पूछो तो हमारे परिवार में किसी ने कोई सरकारी नौकरी आज तक नहीं करी. और जब मैं अपने टीम्स में था उस समय तक तो बिल्कुल भी नहीं करी किसी ने. तो नौकरी हमारी सोच का विषय कभी नहीं रहा. अच्छा नौकरी का कभी भाव कभी ख्याल मन में आया ही नहीं. परिवार में कभी नहीं. परिवार में नहीं आया. लेकिन जहाँ तक मेरे बचपन की यादें जो मुझे आज याद है. जो स्मरण है वो इस बात पे हमारा विश्वास था कि हम पढ़-लिख कर के एक छोटी-मोटी नौकरी करके अपना जीवन यापन कर लेंगे. लेकिन वो सरकारी नौकरी की तरफ कभी भी नहीं था. कि प्राइवेट नौकरियां भी उस समय मिलती थी. यहाँ पर सवाल इस बात का है कि किसी भी देश में हर व्यक्ति नौकरी नहीं कर सकता. सरकारी नौकरी. सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. किसी भी सरकार के पास इतने opportunities नहीं होती हैं कि वो अपने देशवासियों को 100% job secure करके provide करा दें. इसके लिए तो हमें ही अपने अंदर स्किल्स ऐसी पैदा करनी पड़ेंगी. कि जो हमें आत्मनिर्भर बनाए और हम किसी भी प्रकार से अपने सेल्फ एम्प्लॉयमेंट में रह कर के अपना जीवन यापन करें और साथ ही साथ हम कुछ रोजगार provide करें। क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा तो ये problem हमेशा रहेगी।

रही बात माँ-बाप की expectation की जो आपने जिक्र किया। माँ-बाप की expectation हो सकती है। but उनकी expectation नौकरी तो मैं नहीं कहूंगा कि hundred percent होती है उनकी expectation ये होती है कि मेरा बच्चा पढ़ने के बाद proper जगह पे settle हो जाए और अपने जीवन यापन के लायक वो बन जाए और उसका जो अपना परिवार है उसका लालन पोषण अच्छी तरीके से कर सके but as I said earlier कि हर एक के लिए नौकरी और सरकारी नौकरी तो खास तौर से पॉसिबल ही नहीं है. तो उसके लिए आपको खुद ही अपने आप को स्किल्ड करना होगा. और मैं तो एक बात ये भी कहूँगा इसी से कि आजकल इंटरनेट का जमाना है. आजकल मैं देखता हूँ हमारी युवा पीढ़ी ज्यादातर सोशल मीडिया पे अपने आप को एंगेज करके रखते हैं. तो बजाय इधर-उधर की चीजें देखने के अपनी स्किल्स को शार्पन करने के लिए उस मीडिया को यूज करेंगे. उसको अगर मैं ये कहूँ कि उस use ना करके उसका use करें। तो ये एक बेहतर चीज होगी और अपने आप को कर सकते हैं।

रविंद्र गौतम:

और avenues ढूंढ सकते हैं कि बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आपकी इंटरनेट का use करते हैं युवा पीढ़ी मोबाइल पे खूब अपना टाइम नष्ट करती है बिल्कुल जी सही कह रहे हैं कि आप अपने समय को सदुपयोग करें ना कि उसका दुरुपयोग करें और सिर्फ फालतू के देख के जो आपको सिर्फ entertainment के लिए हो चीजें हैं उनको ना देखें बल्कि ये देखें कि आप अपनी skills को कैसे बढ़ाएं? Enhance करें आपको जीवन में वो पैसे कमा के दे सकें. वीरेंद्र जी जैसा अभी आप चीजें बता रहे हैं कि आप धीरे-धीरे चीजें बढ़ते गए आपने कर्म किए जब हम कर्म करने की बात करते हैं जब आपको पहला कहते हैं ना पहली कमाई जिस हर एक की पहली कमाई कोई ना कोई तो होती ही है तो ऐसी पहली कमाई कौन सी थी जिससे आपको ख़ुशी मिली कि यार ये तो मैंने सोचा नहीं था और ये हो गया.

वीरेंद्र गोयल:
इसी वाक्य में मुझे ख़ुशी कब मिली शायद मुझे याद नहीं होगा लेकिन इससे रिलेटेड एक बात जरूर है जो कि मेरे जहन में आज तक है जब मैंने 1984 में अपनी CA Exam पास किए. तो जहाँ पर मैंने ट्रेनिंग करी थी वहीं पर ही हमने अपना जॉब स्टार्ट किया. तो जिस समय मैं सीए फाइनल के पेपर दिए थे उस समय हमारी जो सैलरी थी वो साढ़े सात सौ या आठ सौ रुपए पर मंथ तो जब मैं सीए क्वालीफाई कर गया तो वहीं पर ही जब हमने उन्होंने इच्छा जाहिर करी कि आप कंटिन्यू करें तो हमारी सैलरी उस समय पंद्रह सौ रुपए और आप यकीन मानिएगा कि जब मुझे ये बात पता लगी तो मेरा बस एक ही मन कर रहा था कि मैं किसी तरीके से घर जा के अपनी माँ से ये बात शेयर करूँ और मैं घर आया और आज भी मुझे वो एक-एक सीन याद आए. हाँ उस समय वॉल्ड सिटी में रहते थे. तो जब मैं घर आया और मैंने अपनी मम्मी से ये बात शेयर करी कि मेरी तनख्वाह पंद्रह सौ हो गई. उन्होंने रो रो करके घर भर दिया ख़ुशी के आँसू मतलब वो पंद्रह सौ रूपए का सुनने के बाद जो घर में खुशी का माहौल आया वो शायद आज मैं करोड़ों रूपए भी कमा करके शायद वो खुशी ah नहीं हासिल कर पाउँगा या कर पाता हूँ जो पंद्रह सौ की खबर सुनके हमारी माँ को यानी कि मात्र साढ़े सात सौ रूपए है ना जो भी है मतलब कुल मिला के वैसे तो खुशी की बात थी क्योंकि salary दोगुनी हुई और


रविंद्र गौतम:

बिल्कुल आपने सही कहा और मुझे जब आप येबता रहे थे तो मैं भी कहीं अपने आप को link कर रहा था तो

वीरेंद्र गोयल:
definitely जब आप शुरुआती दौर
में जब आपको ये achievements मिलती है तो मुझे अब ऐसा लगता है
कि जो financial achievement अब चाहे कुछ भी हो जाए but वो जो
ख़ुशी उस वक्त आई थी वो शायद कभी भी नहीं आ पाएगी और हकीकत है ये
जो पहले जब छोटी-छोटी कभी कोई काम मिल हम लोग करते थे, उसमें
से कुछ realization होती थी, फीस आती थी, तो उसकी जो ख़ुशी होती
थी, आज वो कहीं ना कहीं miss करते हैं।

कहीं ना कहीं miss
करते हैं, या यूँ कह लें कि वो वाला खाता पूरा हो गया, ईश्वर की
कृपा वाली जो हम बात कर रहे थे, हो सकता है ईश्वर ने system
बनाया हो कि भैया ये वाली ख़ुशी तुमको एक ही बार मिलेगी।
वीरेंद्र जी, जब आप ने कहा कि जॉब की, आपने शुरुआत में तो अपना
बिजनेस करने का ख्याल कब आया? आपको कब लगा कि मुझे अपनी
practice करनी चाहिए? आपको कब लगा कि मुझे दूसरे avenues भी
तलाशने चाहिए? ये ख्याल कैसे? या ये ऐसी कैसी situation बनी कि आप
अपने व्यवसाय में आए?

वीरेंद्र गोयल:
Well, eighty four जुलाई में हमारा
result आया और जहाँ से मैंने ट्रेनिंग की थी अ मिस्टर रमेश
चंद्र गुप्ता chartered accountant जो हमारे बॉस थे और
जो कि श्रीराम कॉलेज of commerce में lecturer भी थे। तो उनके साथ
मैंने ninety three तक काम किया उन्होंने उनका भी एक योगदान है
मेरे जीवन में. उन्होंने मुझे पॉलिश किया. मुझे वो टेक्निक से
सिखाई. तो फिर मुझे लगा कि अब एक उन्नीस सौ अस्सी से तिरानवे का
एक लंबा अंतराल हो गया. मुझे अपना कुछ शुरू करना चाहिए. उसके
बाद फिर मैंने ninety three में वहाँ से separate होकर के अपना
अलग venture शुरू किया. Of course अपने एक पुराने मित्र के
साथ partnership में करके कुमार कुशल कंपनी के नाम से chartered
accountancy की. अपनी practice individual practice करी और एक
जूनून था, एक passion था। दिन-रात काम करके हमने अपना एक
नाम कमाया। और तरक्की करी, तरक्की के नए आयाम छुए। और उसके
बाद


रविंद्र गौतम:

वीरेंद्र जी जब आप बात कर रहे हैं कि जूनून था, काम किया तो eighty four में आप कितने, बाईस
वर्ष के रहे होंगे? Sixty two, eighty four में twenty three कब
आपने sixty two था? मेरा sixty वन। sixty one, ओके सर। नवंबर
से। हाँ, तो तेईस साल के रहे थे तो तेईस वर्ष की उम्र में जुनून
था काम था की तारीख में अगर हम देखे युवा पीढ़ी की हम बात करें
जो अभी आपने कहा था कि युवा पीढ़ी मोबाइल पे अपना समय नष्ट
करती है, ठीक है, misuse करती है, तो वह जूनून तब में और अब
में क्या युवा पीढ़ी बदल गई, समय बदल गया या मोबाइल्स और इन सब की
वजह से लोगों के अंदर distraction हो गया है। रविंद्र
जी, इसको हम generalize नहीं कर सकते हैं। बिल्कुल ठीक कह रहे
हैं आप। इसको क्योंकि हर एक में नहीं है, कुछ लोग हैं। but
majority में हैं। majority में शहरी इलाकों में कम है। क्योंकि
वहां का अपना एक अलग स्ट्रगल है लेकिन मैंने देखा मैं ट्रेवल
बहुत करता हूं तो मैं कई बार राजस्थान के एरिया में जब जाता
हूं तो मैं देखता हूं कि वहां पर आज भी गांव में एक पेड़ बना हुआ
है। पेड़ के नीचे चौपाल टाइप की जगह है और वहां पर मैं देखता हूं
कि दोपहर के टाइम पे युवा मतलब

अठारह साल से ऐसे पच्चीस साल की उम्र के जवान बच्चे पेड़ के नीचे खड़े हो के गप्पे मार रहे होते
हैं और वो व्हाट्सएप पे देख रहे होते हैं. तो वहाँ पे तो मैं कह
सकता हूँ कि वहाँ सुधार की जरूरत है लेकिन मैं ये भी कहना चाहूँगा
कि जो हमारी युवा पीढ़ी है. वो अपने प्रति सचेत भी हैं. अपने
प्रति सजग भी हैं. शहर वाली. शहर वाली भी कह सकते हैं और सेमी
ग्रामीण क्षेत्र के भी लोग कह सकते हैं. जैसे मैं कानपुर से
आता हूँ. तो कानपुर में भी बहुत ज्यादा कुछ मैं देखता हूँ कि
बिल्कुल अपनी एक मेन लीग से हट गए हैं।

हम्म तो बट ये है इसको
अह बट उनके लिए तो यही है कि इससे बाहर निकल के और उसी
टेक्नोलॉजी को अपने use के लिए करें तो बेहतर करें। युवा काल
में व्यक्ति को युवा को, युवकों को कितने घंटे काम करना चाहिए?
दिन में चौबीस घंटे होते हैं। कितने घंटे काम करें? जिससे वो
सफल होने की संभावनाएं उसकी प्रबल हो जाए। रविंद्र जी, बड़ी
सब्जेक्टिव चीज है इसको हम जनरलाइज फिर मैं कहूंगा कि नहीं
कर सकते जहां तक काम करने की बात है तो मैं मानता हूं कि अगर आप
अपने आप को व्यवस्थित तरीके से काम कर रहे हैं ठीक से ऑर्गेनाइज
करके कर रहे हैं तो शायद दस घंटे की वर्किंग भी काफी है और अगर आप
अपने आप में ऑर्गेनाइज नहीं है तो शायद आप अठारह घंटे काम कर
लें तो यानि कि कम से कम आप ये मानते हैं कि दस घंटे तो काम
करना ही चाहिए दस घंटे दस घंटे

ईश्वर ने पूरी क्षमता दी है ईश्वर ने तो क्षमता चौबीस घंटे भी करने की दी है लेकिन वो लॉन्ग
टर्म में लगातार नहीं है। अगर आप दस घंटे की working efficiently
करते हैं, फोकस होकर के करते हैं घर की चीज अपने उस काम के टाइम,
टाइम पर ऑफिस में नहीं लाते हैं। मतलब काम के समय में यदि काम ही
करते हैं और दस घंटे कर लें तो बहुत है। दस घंटे मैं समझता हूँ
बहुत है जो कि बाद में अगर हमारी एज में आते-आते वो आठ घंटे तक भी
रह जाती है। उसमें तो क्या होता है कि जब आप आगे grow करते चले
जाते हैं तो आपको सपोर्टिंग हैंड्स मिलते चले जाते हैं तो
आपका काम बट जाता है। तो इसको हम इस तरह से भी देख सकते हैं लेकिन
आपके हिसाब से जो आपका कहना है कि भाई दस घंटे यदि व्यक्ति फोकस
हो के काम कर ले तो उसकी सफलता मैं ऐसा मानता हूँ कि हाँ
पर्याप्त है। अब इसमें एक और

प्रश्न यहाँ पे मैं पूछ रहा हूँ
क्योंकि मैं युवाओं के नजरिए से भी प्रश्न पूछ रहा हूँ और मैं
चाहता हूँ कि वो इससे motivate क्योंकि जैसे मैंने कहा कि युवा
अपनी education पूरी कर लेता है उसके बाद वो सोचता है सरकारी
नौकरी के लिए प्रयास करता है मैं अह जो semi आप ग्रामीण क्षेत्रों
की बात कर रहे थे but उसको जब नौकरी नहीं मिलती है तो वो हताश
हो जाता है क्योंकि मैंने बहुत सारे इस तरह के programs किए
जहाँ पे युवा अपनी अह रोजगार को ले के हमें अप्रोच करता रहता है
कि साहब आप हमारे लिए प्रोग्राम करिए। क्योंकि सरकार नौकरी नहीं
निकाल रही है और जब नौकरी नहीं निकालती तो वो कहता है कि हम
अपना टाइम मोबाइल देख-देख के यूट्यूब और इंस्टाग्राम देख-देख
के काटते हैं। तो उनको आप क्या संदेश देना चाहते हैं कि भैया
आपकी education पूरी हो गई। नौकरी अगर सरकारी नहीं मिल रही
तो उनको अपने टाइम का सदुपयोग कैसे करना चाहिए, जिससे उनके
जीवन में आगे चल के सफलता आनी शुरू हो जाए। रविंद्र जी सिंपल
सी है कि मैंने जैसे कि पहले भी कहा कि सरकार के ऊपर अपनी
निर्भरता छोड़ दीजिए. हो जाए बहुत अच्छी बात है लेकिन आप उसके
भरोसे अपना जीवन व्यतीत नहीं कर सकते उसके लिए हमें खुद के लिए
अपने आप को तैयार करना होगा. और वो तैयार करना जैसे एग्जांपल के
तौर पे मैं बताता हूँ जो हमारे युवा ग्रामीण क्षेत्र में है.
क्योंकि मैं अगेन उत्तर प्रदेश से आता हूँ तो उसका influence
मेरे ऊपर है और उत्तर प्रदेश एक बहुत बड़ा प्रदेश और बहुत बड़ी
पॉपुलेशन के साथ है और वहाँ पर युवा बहुत ज्यादा हैं. जो कि
ग्रामीण क्षेत्र में हैं. तो खाली ट्रेडिशनल मेथड से काम करते
रहेंगे तो उससे आने वाले टाइम में अब गुजारा नहीं है. आप हमारा
कंट्री भी पूरा वर्ल्ड एक ग्लोबल विलेज हो गया है. पहले तो बाहर
की चीजें हम नहीं पता लगा सकते. लेकिन अब तो सोशल मीडिया के
माध्यम से एक सेकंड में विदेश में क्या हो रहा है? इंडिया में
वो घटित होता है. सबसे बड़ा एग्जांपल हम इजराइल का ले सकते
हैं. अगर हम खेती की बात करते हैं. तो इस अपने challenges को
पार करते हुए नई-नई techniques ग्रामीण क्षेत्र में खेती के लिए
for example इजात करी हैं जो कि

आजकल सोशल मीडिया के माध्यम से हमें मिलती है, देखने को मिलती है, समझने को मिलती है। तो वहां से हम अपने आप को भी कर सकते हैं। हम उस टूल को इस्तेमाल कर
सकते हैं, जानकारी तक पहुंचने के लिए और वहां से हम अपने आप कोर्सेज हो रहे हैं, जाहिर है कि विदेश जाना आने के लिए संभव नहीं
है लेकिन हम इंडिया में रहकर के भी अपनी को कर सकते हैं और हम
अपने हमें अपने आप को खुद को मजबूत करना होगा अगर हमें इस
समस्या से उभरना है सरकार के या किसी प्राइवेट जॉब के भरोसे रहकर
के आप अपना समय वेस्ट नहीं कर सकते. समय नहीं वेस्ट कर सकते
हैं अपने जीवन को वेस्ट नहीं बहुत कीमती है समय को सदुपयोग
करते हुए आप अपनी तैयारी आज से

ही शुरू करें और समय लगेगा लेकिनचीजें पॉजिटिव होंगी. वीरेंद्र जी आपने बहुत अच्छी बात कही कि
भई समय का सदुपयोग करें और जैसा वीरेंद्र जी ने कहा इजरायल का
एग्जांपल दिया अह एग्रीकल्चर को ले के हमारे देश को हम भी, हमने
भी पढ़ा है, आपने भी पढ़ा होगा, आज भी शायद पढ़ाया जाता होगा। कि
भारत एक कृषि प्रधान देश है। तो जो लोग ग्रामीण क्षेत्रों में
रहते हैं, उनको ये सोचना चाहिए कि उनके खेत में खेती कैसे
आधुनिक तरीके से हो सके और उसके लिए आप यूट्यूब में जा के इजरायल
का जैसे बताया और भी मैं समझता हूँ बहुत सारे लोग इस तरह के
वीडियोज डालते रहते हैं कि क्या खेती करनी चाहिए, कौन-सी फसल के
दाम अच्छे मिल रहे हैं, किसकी डिमांड ज्यादा है? तो अगर डिमांड
एंड सप्लाई को देखते हुए यदि आप खेती करते हैं। तो मैं समझता हूँ
उसमें भी आपको नौकरी की जो तलाश की बात करते हैं वो ख़त्म हो
जाती है। मैंने एक आपसे सवाल किया था कि आपको पहला वेतन या
पहली कमाई पे कब ख़ुशी हुई थी ख़ुशी से जुड़ा हुआ सवाल मुझे
आया कि कौन सा वाहन खरीदने में आपको सबसे ज्यादा ख़ुशी महसूस
हुई। मैं ये नहीं पूछ रहा हूँ कि वो मर्सिडीज़ थी या वो स्कूटर था
या वो बाइक थी या कार थी क्या था वो?

रविंद्र जी वैसे तो ये बड़ा subjective है अह अह सवाल है लेकिन मेरी अपनी जहाँ तक व्यक्तिगत बात है तो मैं ninety two में पहली बार एक पुरानी और वो feed if I remember correctly वो कम से कम, कम से कम
पच्चीस-तीस साल पुरानी थी उस समय जो उसको लाकर के जो एक फीलिंग आई एक sense of accomplishment आया वो शायद आज बड़ी गाड़ियों में भी
नहीं महसूस होता जो three जो excitement उस समय महसूस हुई 1992 में एक पुरानी फेयर लेकर के हालांकि उसके बाद I
think एक साल रखने के बाद हमने उसको dispose up कर दिया because
उसका maintenance का अपना एक अलग challenge था but yes proud moments तो उसी पे थोड़ा सा मैं पूछता हूँ कि जैसे आपने कहा
thrill था तो पहले दिन लाए थे, तो उस दिन आपको जिस दिन लाए थे
और जिस दिन लाने वाले थे, मतलब

एक दिन लाने से पहले आपको पता होगा कल मुझे लेने जाना है। तो जिस दिन लेने जाना है, उस दिन
नींद आ गई थी आपको? और जिस दिन ले के आए थे, क्या उस दिन भी
आपको नींद ठीक से आ गई थी? नींद तो आ गई थी लेकिन इसमें भी बड़ा
interesting है कि जब मैं लेने गया वहाँ पे, मुझे अच्छी तरह याद
है मैं कैलाश hills के ऊपर किन्हीं सज्जन के पास तो शायद वो
किसी काम में व्यस्त थे तो वो बाहर आने में बहुत टाइम लगा रहे
थे. वो टाइम बहुत मुश्किल से कटा. कि किसी तरह से ये डील
फाइनल हो और हम मार के चले. वो अलग बात है कि महीने भर बाद ही
हम अच्छे खासे मैकेनिक बन गए. क्योंकि बजाय हमने उचित समझा कि
हम मैकेनिक के पास जाने की बजाय आत्मनिर्भर हो जाएं और उसको ठीक
करना सीख लें. हम मैकेनिक जरूर हो गए थे. बिल्कुल ठीक है. मुझे
भी याद आ गया कि मेरा एक कार थी तो वो भी mechanic था वो कहता था
पाजी चिंता मत करो but उसका कहने का मतलब इशारा कौन सा था वो नहीं
समझ में आया बाद में समझ में आया कहता था जी धक्का मारो पीछे से
कई बार ऐसा हमारे साथ भी हुआ।

वीरेंद्र जी आप कुल मिला के overall एक luxurious लाइफ जी रहे हैं। उम्र भी आपकी बासठ हो
चली है। सरकार साठ साल में कहती है retired हो जाओ। लेकिन अब
आपका अपना काम है अपना व्यवसाय है तो रिटायरमेंट तो होनी नहीं
है। बच्चे आपके दो हैं, married भी हैं और सात के सात established भी हैं। अब आपके पास जिम्मेदारी किस चीज की है? क्या
करना चाहते हैं जीवन में? क्या ऐसे ही पैसों के पीछे भागते रहना चाहते हैं? और इकट्ठे कर लूँ और दो-चार करोड़ और सौ करोड़ रुपए
इकट्ठे कर लूँ, क्या करना चाहते हैं? आज के युग में रविंद्र जी सरकार की रिटायरमेंट की एज से वास्तविक रिटायरमेंट का कोई
लेना-देना नहीं है. वो महज एक आंकड़ा है. और हमारे जैसे जो सेल्फ एम्प्लॉयड प्रोफेशनल्स हैं वो कभी रिटायर नहीं होते. ऑन द
कॉटेरी साठ के बाद तो वो अनुभवी होते हैं. वो इस पोजीशन में जरूर आ जाते हैं कि जो भी उन्होंने पैंतीस साल, चालीस साल, पैंतालीस
साल काम किया है. उसके अनुभव का एक एन कैप्सूल बनाकर के वो दूसरों की मदद कर सकते हैं. और अब knowledge को import करके,
share करके बेहतर वर्किंग एनवायरनमेंट क्रिएट कर सकते हैं ऐसा मेरा मानना है. तो जहाँ तक मेरे करने का सवाल है तो हमारी
तो कभी भागने की चाहत नहीं थी. मैं बाय नेचर बहुत एक लेड बैक सा इंसान हूँ. कभी भाग दौड़ी में हमारा विश्वास नहीं रहा. लेकिन
अब जिम्मेदारियां तो इंसान की

कभी खत्म नहीं होती लेकिन आपको कहीं ना कहीं अपना एक डिफाइन करना होता है कि एक लाइन ड्रा
करनी होती है कि आप कहां पर रुकना है और कहां तक आपको चलना है. तो मैं समझता हूं ईश्वर की कृपा से बच्चे हमारे सेटल हो गए. मैं दोनों बच्चे मैरिड हैं, अपनी-अपनी लाइफ में हैप्पी मैरिड
हैं, खुश हैं. अपने-अपने काम में बिजी हैं. तो मुझे लगता है कि मेरी जो पर्सनल इच्छा है वो ये है कि जो मैंने एक्सपीरियंस गेन किए हैं ड्यूरिंग द कोर्स ऑफ लास्ट फोर्टी थ्री इयर्स ऑफ माय
वर्किंग एक्सपीरियंस वो मैं अब समाज के साथ साझा करूँ. आज बहुत से मेरे मित्र हैं जो किसी ना किसी चैलेंज से लोग गुजरते हैं
हम लोग आम इंसान तो चैलेंज से गुजरता ही है तो मुझे अब इस बात में थोड़ा सा एक सेटिस्फेक्शन मिलती है कि मैं अपने
एक्सपीरियंस शेयर करके उनकी लाइफ को कुछ आसान कर सकूं. तो अभी तक
तो हम लोग समाज से लेते ही आए  हैं. चाहे वो सब्सिडाइज्ड एजुकेशन के रूप में लिया हो, चाहे वो यूसेज ऑफ
इंफ्रास्ट्रक्चर हो सरकार द्वारा वो तो आज भी चलता रहेगा. चलता
रहेगा. अब दिली इच्छा ये है कि अपने लिए बहुत समाज के लिए भी
करते रहना चाहिए हालांकि ये हम आज से करीबन आज दो हजार तेईस है
तो दो हजार तीन में हमने शुरू किया था अपनी एक यात्रा आज एनजीओ
के रूप में तो वो पिछले बीस वर्षों से हमारी चालू है और उससे
हमें एक फायदा जो सबसे बड़ा हुआ कि हमें कभी इस बात का एहसास ही
नहीं हुआ कि अब सिक्सटी के बाद क्या? क्योंकि वो एक
कॉन्टीन्युटी में चला आ रहा है. मतलब जो यात्रा जो लोग कहते हैं
ना कि समाज सेवा की जब बात करो तो लोग कहते हैं अभी क्या करना
साठ साल के बाद करेंगे सत्तर के बाद करेंगे यानि कि अभी तो मेरे
अपने लिए की आवश्यकता है तो वह यात्रा आपने आज से बीस साल पहले
ही शुरू कर दी थी जिस वजह से शायद आप कह रहे हैं कि मुझे समझ
नहीं आ रहा कि ऐसा कुछ क्या

सोचूं यह तो मैं पहले से ही कर रहा हूं लेकिन इस संस्था के माध्यम आज के माध्यम से आप समाज
का किस तरह से भला कर रहे हैं और आगे फ्यूचर प्लान अगर मैं बात करूं अगले दस सा लो में या पंद्रह सा लो में आप क्या सोचते
हैं कि मैं किन लोगों की लाइफ में इस संस्था के माध्यम से अपने माध्यम से इंपैक्ट डाल सकता हूं सबसे पहले तो मैं एक चीज clarify
कर दूँ। कि ऐसा सोचना कि हम समाज का भला कर रहे हैं। ये शायद उचित
नहीं होगा। अगर हम समाज के लिए  कुछ कर रहे हैं, तो यकीन मानिए
कि वो हम अपनी सेल्फ सेटिस्फेक्शन के लिए अपनी प्राइड
के लिए कर रहे हैं। एक सेंस ऑफ फुलफीडमेंट, एक सेंस ऑफ अचीवमेंट
की फीलिंग होती है, जो कि आपको at the end of the डे कहीं ना
कहीं satisfy करती है, तो सच कहूं। तो समाज के लिए ना हम ये
अपने लिए कर रहे हैं. और मेरा ये मानना है कि समाज किससे बना है?
लेकिन डायरेक्टली और इनडायरेक्टली समाज का तो भला हो
ही रहा है. वो है वो, वो एक बाय प्रोडक्ट है. बट प्राइमरली हमारा
अपना डिफ्रेंटली और मैं एक बात और कहना चाहता हूँ इसमें कि समाज
क्या है? समाज हमसे और आपसे बना

है. बिल्कुल. मेरा ये बहुत firm belief है कि अगर हम और आप जिससे समाज बना है. अगर हम खुश
हैं। जो काम हम कर रहे हैं उसमें हमें ख़ुशी मिलती है, हम संतुष्ट
हैं। तो एक अच्छे समाज का  निर्माण तो वैसे ही हो जाएगा। और
जब अच्छे समाज का निर्माण होगा तो अच्छे राष्ट्र का निर्माण तो
वैसे ही हो जाएगा। तो हमें बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने की जरूरत
नहीं है, लक्ष्यधारी करने की जरूरत नहीं है। बहुत सिंपल सा
काम करना है कि अगर हम सब अपने आप से प्रण लें। अपने आप में ये
डिसाइड कर लें कि हमें खुश रहना है, असंतुष्ट रहना है, हर हाल
में तो अच्छे राष्ट्र का अपने आप ही हो जाएगा और एक अच्छा ग्लोबल
विरेज अपने आप तैयार हो जाएगा। it’s a very simple concept. जी
आपकी बातों से ऐसा लग रहा है आप

में बहुत माहिर हैं। आपने कहा हम लच्छेदारी वाली बातें नहीं करते हैं। अब मैं एक ऐसा प्रश्न आपसे
पूछने जा रहा हूँ तो आपकी वो पता लगेगा कि है या आप बिल्कुल सही बोल रहे हैं। आपके साथ काफी सारे लोग काम करते हैं। क्या वह टीम
वह employees चाहे वो घर में काम करने वाले लोग हो या ऑफिस में काम करने वाले लोग हो या साइट पे काम करने वाले लोग हो, आपसे
प्रसन्न रहते हैं? मैं ऐसा रहते होंगे और वो मैं क्यों मानता हूँ वो भी आपसे शेयर कर लेता हूँ कि मेरे ऑफिस में जो स्टाफ स्ट्रेंथ
है इस समय से मेरे साथ ही आज अपना तीसवां वर्ष हमारे ऑफिस में
पूरा कर रहे हैं. तो मैं ऐसा मानता हूँ कि अगर वो तीस सालों
से या सत्ताईस सालों से या पच्चीस सालों से हमारे साथ हैं. तो शायद वो खुश ही होंगे. उनके
लिए ठीक ही कर रहे होंगे. ऐसा मेरा मानना है. बिल्कुल मैं आपके और बाकी आपको अगर सच्चाई जाननी
है तो आपको उनका पड़ेगा.

बिल्कुल. अपने मुँह से तो हम क्या कहेंगे? नहीं अब वो तो देखेंगे नीचे comment में लिख
देंगे ना कि हम खुश है या नहीं है तो नहीं ये बिलकुल आपने ah सही बात कही अगर लोग प्रसन्न होंगे तो लंबे साथ आपके साथ चलते
है और हालांकि जो आपने कहा समाज के लिए जब हम काम करते है तो आप सब लोग जानते है कि बहुत सारे ऐसे लोग भी होते है कि समाज के
लिए काम करते है कई बार वो सिर्फ अपनी तस्वीर खिंचवाना चाहते है कहीं लगाना चाहते है कहीं दिखाना चाहते है लेकिन जो उनके इर्द
गिर्द रहने वाले लोग है उनके साथ काम करने वाले है उनके यार दोस्त है उनके हैं उनकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता है कि कभी अगर वो
मुसीबत में हो तो उनकी वो मदद करें। but होलिस्टिक जीवन जीने के लिए समाज में और जीवन में बहुत काम करने पड़ते हैं। जहाँ
तक अह अह लीडरशिप की बात है, what is लीडरशिप? The ability to take masses around, सबको साथ ले कर चलने की कला को ही तो लीडरशिप
कहते हैं। अकेला चल के आप कहां पहुंचोगे? अकेला चलोने वाली
कॉन्सेप्ट आई डोंट थिंक कि आज की डेट में कोई बहुत ज्यादा का कोई
मायने है जब तक की आपके पीछे आपके सपोर्ट में लोग ना चले तो
अकेला चलने से आप कुछ हासिल नहीं कर सकते। हाँ कहा भी जाता है ना
कहावत है पुरानी हिंदी की एक शायर कि अकेला चना भांड नहीं
फोड़ सकते। भांड नहीं फोड़ सकते। बिल्कुल ठीक है। बिल्कुल ठीक है।
तो अह अगर हम बात आपने जो एक अभी थोड़ी देर पहले कही थी कि साठ
साल की उम्र हो गई हमने इतना अनुभव ले लिया है इतना तजुर्बा
ले लिया है और इस अनुभव इस तजुर्बे को समाज के साथ सोसाइटी
के साथ जिनको जरूरत है उनको बाँटना है उनको शेयर करना है।
जिससे वो लाभ हो सके अपने जीवन में। तो क्या आपने कोई ऐसा
रोडमैप बनाया है? क्या आपने कहा जो मैंने अपने अनुभव के कुछ
कैप्सूल्स बनाए हैं? कोई उनको पैन डाउन किया है कि मैं इस इस
क्षेत्र में लोगों की मदद कर सकता हूँ और मैं इस तरह से
करूँगा। ऐसा तो पेन डाउन तो नहीं किया है लेकिन यस during the
course of टाइम, if I feel the नेसेसिटी तो वो भी हम करेंगे।
लेकिन इतना जरूर है कि मैं चूँकि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के
नाते फाइनेंसियल वर्ड से आता हूँ। तो मैं अपनी युवा जो भी
मेरे interaction में आता है तो उसको एक बात ज़रूर कहता हूँ कि
आप मेहनत कर रहे हैं, दिन-रात

मेहनत कर रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं। उस पैसे को ढंग से deploy करना भी बहुत बड़ा challenge है
और अगर कम उम्र से एक अच्छी की habit develop कर ली जाए। मिसाल के तौर पे कमाई में जब इंसान busy हो जाता है, तो उसको आज एक
छोटी सी बात है, health insurance है। health insurance पे उसका दिमाग नहीं जाता या उसके बारे में उसके पास जानकारी नहीं
है और भगवान ना कोई फस जाए तो उसको पता नहीं करे मैंने हेल्थ इंश्योरेंस ली थी लेकिन वो पता लगा पर्याप्त नहीं है या तो वो
लिमिट से बहुत कम करा ली गई या लिमिट से बहुत ज्यादा करा ली गई
तो मेरा जो अल्टीमेट गोल है मुझे ऐसा लगता है कि इस तरह की चीजों
पे मैं आकर के और इसको समाज के सामने अपने अनुभव को शेयर कर
सकता हूँ और आज आपसे आपने एक बड़ी अच्छी बात कही जो कहीं ना
कहीं दिमाग में चल रही थी कि इनको करके एक प्रॉपर व्यवस्थित
तौर पे इसको पब्लिक तो वीरेंद्र जी जब हम फाइनेंसियल लिट्रेसी की
बात कर रहे हैं, आप कह रहे हैं कि भई लोगों में एक वैक्यूम है,
तो क्यों नहीं आप ये फाइनेंसियल लिटरेसी को एक अपनी मुहिम बनाते
हैं और आसक के तहत लोगों को जागरूक करने का काम शुरू करते
हैं. कर सकते हैं, लेकिन जैसे कि

AAS का तो फुल फॉर्म ही यही है,
ऐटीट्यूडन अवेयरनेस सोसाइटी क्योंकि हमारा मानना ये है कि आप
किसी दूसरे को परिवर्तित नहीं कर सकते. अगर आपको कुछ परिवर्तन
परिवर्तन या दिखने वाला परिवर्तन ले के आना है. तो उसके लिए क्या
कर सकते हैं आप? आप अपने आप को चेंज कर सकते हैं? तो जब आपका
नजरिया ठीक होगा तो आपको सब कुछ ठीक दिखने लगेगा तो attitude में
अवेयरनेस इन सोसाइटी के नाम से जब हमने आज को चालू किया तो
हमारा प्राइमरी फोकस था उसमें हेल्थ और एजुकेशन का एजुकेशन
जाहिर है कि हम जो हमारे अह प्रतिभावान छात्र हैं स्टूडेंट्स
हैं जो किसी वजह से आगे नहीं पढ़ पाते हैं उनको गाइडेंस का आभाव
है या संसाधनों का अभाव है तो वहाँ पर आज टाइम टू टाइम मैं ये
तो नहीं कहूँगा कि बहुत ज्यादा संख्या में हमने ये कर लिया
लेकिन प्रयास किया और सफल प्रयास किया। हेल्थ के क्षेत्र में हम
लोगों ने एक बीड़ा उठाया हुआ है कि कैंसर आपको पता है कि कैंसर
में सर्विकल कैंसर और ब्रैस्ट कैंसर आपस में आँख मिचोली का खेल
खेलते हैं। जी नंबर वन और टू की प्रतिस्पर्धा चल रही है। तो हमने
दो हजार नौ दस के आसपास ये पाया है कि सर्विकल कैंसर के बारे में
बहुत ज्यादा इतनी होनी चाहिए उतनी नहीं है और आंकड़े जो उसके
जो दुष्प्रभाव है वो डराने वाले आंकड़े थे. तो हमारी वाइफ वर्षा
गोयल जो कि उसकी प्रेसिडेंट हैं फिर उन्होंने इसके ऊपर अ काम
करना शुरू करा.

Fortunately हमें डॉक्टर अंशुमन कुमार का साथ मिला. डॉक्टर रीता बक्शी का साथ मिला जिन्होंने हमारी शुरुआती
दौर से आज तक हमारे साथ रही हैं, हमें गाइड करती रही हैं. तो
हमारा मानना ये है कि करने को तो हम इसमें कर सकते हैं. लेकिन एक
ही एनजीओ में बहुत ज्यादा चीजें अगर हो के चल रहे हैं. तो हम
फोकस हो के करना चाहते हैं और एक बात मैं और शेयर करूंगा कि हम
लोग चाहते हैं कि अब चूँकि हमारे भारत में ही अ सर्विकल कैंसर का
वैक्सीन बनना शुरू हो गया है. तो हमारा अगला पड़ाव जो है वो
एचपीवी वैक्सीन का के लगवाने का कैंप लगाने का चलाने का हमारा
अगला आसन के तहत आस के तहत ही है ओके तो हमारी बातचीत चल रही है
कोई ऐसा टारगेट आपने लिया है कि मैं अगले पाँच सालों में या दस
सालों में कितने लोगों को वैक्सीनेट करेगी आस। रविंद्र जी
दिल तो बहुत कुछ चाहता है करने को दिल मांगे मोर दिल मांगे मोर
और होना भी चाहिए क्योंकि वही एक आपके लिए एक सोर्स ऑफ इंस्पिरेशन
होता है मोटिवेशन का फैक्टर होता है लेकिन हमें अपने रिसोर्सेज को
भी देखना है हमें अपने समय को भी देखना है। तो हम यथासंभव प्रयास
करेंगे कि जितना हम maximum कर सकें। इसको संख्या में possible
हो सकेगा जितना आप लोगों ने कहा कि ईश्वर की जैसी कृपा होगी तो
ईश्वर जैसी कृपा करेगा तो उसके according चलेगा।

वीरेंद्र जी अह
हर व्यक्ति का कहते हैं ना चाहे अमीर हो, गरीब हो, छोटा हो, बड़ा
हो किसी भी जाति, प्रजाति या समाज से आता हो सभी के एक चीज
जरूर होती है सबके पास शौक आपकी कोई हॉबी है? मतलब गलत हो गया
सवाल कि कोई हॉबी है? मैंने पहले ही कह दिया सबकी होती है. तो मैं
कहूँगा कि आपकी क्या हॉबी है?

हॉबी तो है. सबसे बचपन में तो हमने क्रिकेट इतना खेला कि हम कभी प्रोफेशनल स्टेज पर तो नहीं
पहुँच पाए लेकिन क्रिकेट आज भी देखने का शौक ज़िंदा रखा हुआ है.
रात के बारह बजे भी अगर कोई मैच आ रहा है तो हम कोशिश ये रहती है
कि हम उसको पूरा देखें. खेलने का समय अब तो खैर खेलने का शौक तो
थोड़ा कम हो गया लेकिन बचपन में बहुत खेला हुआ है और दूसरा शौक
है छोटा-मोटा सिंगिंग का अच्छा सिंगिंग का गाते हैं आप या सुनते
हैं हमें गवाया गया ऐसा कह सकते हैं अच्छा कि बात करीबन दो हजार
नौ के आसपास की है जाहिर है कि हम भी किसी दौर से गुजर रहे
होंगे कोई चैलेंजिंग दौर से गुजर रहे होंगे तो एक दिन हमारी
श्रीमती जी ने देखा कि हम काफी तनाव में हैं तो उन्होंने किसी
को रिक्वेस्ट करके बुला लिया और एक हार्मोनियम हमारे घर में
बच्चों के लिए रहता था हार्मोनियम रख दिया. बोले अब आज
से गाना गाने की प्रैक्टिस करोगे. हमने कहा हमारी मेरी वॉइस
कभी भी अच्छी नहीं रही. तो मैंने कहा ये क्या? तो बोले नहीं कोशिश
करो तो ये उनकी प्रेरणा थी हमने धीरे-धीरे किया. फिर वो शौक में
डेवलप हुआ. तो मैं ये तो नहीं कहूँगा गाना बहुत अच्छा गा लेते
हैं लेकिन गाना गाना अच्छा लगता है. और अपने लिए गाना अच्छा लगता
है. तो वीरेंद्र जी मैं पूरा लंबा पूरा गाना तो नहीं सुनना
चाहूंगा लेकिन जो आपका फेवरेट गाना हो उसका एक अंतरा सुनाइए.
मैं मोहम्मद अरबी साहब का ये गाना गुनगुनाने की कोशिश करता
हूँ हालाँकि मैं इस समय आउट ऑफ़ प्रैक्टिस हूँ. ये दिल्लगी ये
शौकियाँ सलाम की यही तो बात हो
रही है काम की कोई तो मुल्क देख
लेगा इस तरह कोई नज़र तो होगी
मेरे नाम की। क्या बात है, क्या
बात है। पुकारता चला हूँ मैं
गली-गली बहार की बस एक छाँव
जुल्फ की बस एक निगाह निगाह
निगाह प्यार की पुकारता

बहुत बढ़िया आप तो बड़ा अच्छा गाते हैं। तो ये अभ्यास से प्रैक्टिस से आया। कभी-कभी कर
लेते हैं।

कोशिश करी थी लेकिन रेगुलर होता नहीं है। लेकिन अह गाना अच्छा लगता है। और मुझे वगैरह पे गाना अच्छा नहीं लगता।
लाइव म्यूजिक पे, लाइव बैंड पे गाना अच्छा लगता है। ज्यादा अच्छा लगता है। जी एक और मैं सवाल आपसे करना चाहता हूँ कि
देखिए किसी का भी जीवन जब वो सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ता जाता
है, चढ़ता जाता है, किसी मुकाम पे पहुंचता है। तो मैंने बहुत सारे लोगों के interviews किए, बहुत सारे लोगों से बात की, उनकी
कहानियां सुनी, समझा। मुझे किसी का भी ऐसा नहीं मिला, जिसने कहा हो कि मैं बिल्कुल ऐसे ही चला थाऔर बस आगे चढ़ता चला गया कभी ना
कभी किसी को ठोकर लगती है, कभी कोई नीचे गिर जाता है, फिर कभी उठता है। तो क्या आपके जीवन में भी ऐसा कुछ घटित हुआ जिसने आपकी
स्पीड को रोका हो, थामा हो, थोड़ा सा पीछे खींचा हो, थोड़ा सा के क्षण ले के आया हो। well बिजनेस related दो incidences
रहे और मैं ये तो नहीं कहूँगा कि उन्होंने अह कर दिया उन्होंने हमें अनुभव दिया आगे बढ़ने का कि और बेहतर तरीके से कैसे बढ़ा जा
सकता है जैसा कि मैंने अभी शेयर किया था कि नाइनटीन एट्टी से हमने जब ट्रेनिंग शुरू करी उसी फर्म में हम नाइंटी थ्री तक रहे
तो नाइंटी थ्री के बाद जब हमने इच्छा जाहिर करी कि हम अलग
करेंगे तो वो एक थोड़ा चैलेंजिंग मोमेंट था जिस तरीके से हम चाह
रहे थे उस तरीके से नहीं हुआ लेकिन थोड़ा सा एक ट्रबल
चैलेंजिंग मोमेंट्स के दौरान हम उस पीरियड से गुजरे फिर हमने
अपना अलग शुरू करा जहाँ पे जब हम निकले तो एक ऑलमोस्ट जीरो की शेप
में निकले लेकिन अनुभव हमारे पास था. तो यानि कि उन चैलेंजेस को
आपने पॉजिटिव विटी के साथ में देखा और अपॉर्चुनिटी समझा. फिर
उसके बाद हमने नाइंटी थ्री में

कंपनी शुरू की अपनी फॉर्म चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की. दो हजार पाँच में फिर हमारा उसी जो
पार्टनरशिप हमारी थी उसमें एक फर्दर ब्रेक आया. फिर हम एक नए
चैलेंजिंग दौर से गुजरे. लेकिन मैंने एक चीज महसूस करी जब
चैलेंजिंग दौर होता है तो आप बहुत परेशान होते हैं, बहुत
विचलित होते हैं, तरह-तरह के नेगेटिव आं ख्याल ख्यालात आपके
जहन में आते हैं, जो आपको परेशान करते हैं, जो कि बहुत नेचुरल है,
इसमें कुछ भी नई बात नहीं है. लेकिन मैं अगर एक लाइन में कहूँ
और जब मैं सबको मैसेज देना चाहूँगा कि कभी भी ऐसे दौर से
गुजरे तो ओवर thinking नहीं करनी चाहिए. बिकॉज़ ओवर thinking
always leads to sadness वो आपको और ज्यादा आशंकित करती है और
ultimately frustration होती है फिर सैडनेस होती है. जो हुआ उसको
हम एक्सेप्ट करें. अगर हम चैलेंजेस में हैं तो फर्स्ट वी
मस्ट एक्सेप्ट कि दैट आई एम फेसिंग चैलेंजेस मैं कष्ट में
हूँ बिकॉज़ ये साइंटिफिक फैक्ट है रवि जी कि जब हम ऐसा स्वीकार
करते हैं तो हमारी बॉडी लैंग्वेज हमारी जो केमिकल्स रिलीज़ होते
हैं वो सब इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हम मदद किसी से
मांगते हैं तो वो उसमें वाकई मदद का भाव आता है अगर हम इसको
एक्सेप्ट नहीं करेंगे तो मदद में भी हमारी एक अकड़ होगी जो कि वो
सही तरीके से नहीं पहुँचती है। तो ऐसे में इसको ओवरकम करने का
जो मैं समझ पाया कि ओवर थिंकिंग आलवेज लीड्स टू सेडनेस बहुत
ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. नेचुरल रहे, उसको स्वीकार करें कि हम
परेशानी में हैं. रास्ते ढूंढे.

जिनसे आपको विश्वास है बात करने
में, उनसे बात करते रहें, आपको सलूशन मिलेगा. और मैं जब-जब भी
निकला हूँ अपने चैलेंजेस से. आप यकीन मानिए. उसमें मेरे यार
दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है. बहुत बड़ा हाथ है, उनका
फाइनेंसियल मदद का भी और उनका सबसे बड़ी इमोशनल मदद. जो सही
गाइडेंस मैं मानता हूँ कि पैसे से कोई ज्यादा परेशान नहीं होता
है अगर उसको सही वक्त पर सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वो बड़े
से बड़े चैलेंज को फेस करके निकल सकता है जैसा कि मेरे साथ दो बार
हुआ और मैंने एक चीज और देखा कि ये घटनाएं क्यों आती है जीवन में
वो इसलिए आती है कि ये आपको और ज्यादा परिपक्व करती है. और
ज्यादा मैच्योर करती है तो बाद में कभी छोटी-मोटी इस तरह की
घटनाएं होती तो आप बहुत ज्यादा विचलित नहीं होते. आज अगर आपके
हिसाब से ये सारी चीजें चलें. कई बार ऐसा मोड़ आता है कि आप चाहते
कुछ थे, हुआ कुछ है. परेशान होने की जरूरत नहीं है. क्योंकि अगर
मैं अपनी जिंदगी को देखता हूं कि मैं बासठ वर्ष का जो सफर करके
आया हूं, तो ईमानदारी की बात है, यकीन मानिए कि हमने ना तो कभी
सोचा था कि ऐसा होगा और ना हम ये प्लान करके आए कि हम ऐसा करेंगे
तो ऐसा हो जाएगा. इट जस्ट हैपर्ड. बेसिक चीज जो थी वो ये
थी कि आप लगे रहो. मजाक के तौर पर मैं लगे रहो मुन्ना भाई। जो
एक मूवी का नाम था। आप और हमारे पास और आपके इस माध्यम से आपके
सभी दर्शकों के लिए मैं ये कहना चाहूँगा कि लगे रहो मुन्ना भाई
एक बहुत ही जनरली टर्म है और जीवन के हर पहलू पे खरी उतरती
है, आप जिस कर्म में भी हो उसमें लगे रहो, सफलता आपके कदम अपने आप
चूमेगी। अपने आप चूम लेगी, चाहे देर से ही सही लेकिन चूमेगी
जरूर। वीरेंद्र जी लास्ट मैं आपसे एक क्वेश्चन पूछना चाहूंगा
बल्कि एक संदेश लेना चाहूंगा, अपने दर्शकों के लिए, अपने युवा
के लिए कि वह अपने जीवन में सफलता को कैसे प्राप्त करें
हालांकि आपने एक मंत्र दिया है कि निरंतरता कंटिन्यू लगे रहो
लेकिन उसके अलावा उनको आगे बढ़ने के लिए जीवन में क्या ऐसे दो कदम
उठाने चाहिए जिससे वह जीवन में सफलता को प्राप्त कर सकें. मेरे
हिसाब से consistency and persistency लगातार निरंतर चलना
ही शायद key to success है क्योंकि किसी भी चीज के लिए
basic दो ingredient है अगर आप consistently नहीं कर रहे हैं तो
इसका मतलब you are not very serious to achieve your goal तो
जब आपकी seriousness नहीं होगी तो आप goal कैसे achieve करेंगे
तो वो basic trades है आप चलते रहेंगे आपको रास्ता मिलेगा और
मैं एक बात कहना चाहता हूँ बहुत simple सी चीज है कि जब हम पे
जाते हैं तो हाईवे पे हमें पूरा नहीं दिखाई देता। हमें उतना ही
दिखाई देता है कि जो सड़क सीधी होती है लेकिन इसका मतलब ये नहीं
कि उसके बाद जैसे ही हमें टर्न लेते हैं तो दोबारा उससे भी बड़ी
सड़क हमें दिखाई देती है मार्ग दिखाई देता है। जीवन बिल्कुल उसी
तरीके से हमें जो दिख रहा है वो सामने दिख रहा है कि इस दीवार के
बाद दुनिया खत्म नहीं हो गई है। बट जो सनातन सत्य है वो है ईश्वर
जो एक हमारा अपना उसको सब कुछ दिख रहा होता है उसने हमारे लिए
निर्धारित किया है कि हमें कहाँ पहुँचाना है और धीरे-धीरे आप
चलते जाएंगे रास्ता खुद-ब-खुद बनता चला जाएगा और आप सफलता अचीव
करेंगे. सफलता का पैमाना बड़ा सब्जेक्टिव है. किसी के लिए इतनी
बड़ी हुई सफलता नहीं है और किसी के लिए इतनी भी जिस भी चीज को आप
हासिल करें, खुश रहें. जो मिला है उसको करें. हमारी खुशी बहुत
बड़ी अचीवमेंट की मोहताज नहीं होनी चाहिए. आज बच्चे ने अगर
क्लास में कोई छोटी-सी अचीवमेंट करी है हम क्यों नहीं उसको
सेलिब्रेट कर सकते हम क्यों नहीं उसको यादगार मूवमेंट के तौर पे
हम अह उसको सेलिब्रेट कर सकते हैं जब हम सेलिब्रेट करें घर में
ख़ुशी का माहौल होगा तो जो भी मूवमेंट मिले हम सब उसको एन्जॉय
करें बड़ी ख़ुशी मिलेगी बड़ी अचीवमेंट मिलेगी बड़ी ख़ुशी
मिलेगी वो अच्छी बात है बट उसके चक्कर में हम छोटी-छोटी इन
पड़ावों को ना भूल जाएं क्योंकि जब आपको लंबा डिस्टेंस ट्रेवल
करके जाना होता है आप एक साथ कभी जाते हैं। आप छोटे-छोटे पड़ाव
पार करके अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं तो be happy जो आप कर रहे
हैं उसमें आपको खुशी मिलती है या नहीं वो ensure करें अगर मिलती
है तो उसको enjoy करें, सफलता अपने आप सफलता अपने आप आपको मिल
जाएगी।

धन्यवाद वीरेंद्र जी आपने जो अपनी स्टोरी साझा की और जो
आपने moments बताए मैं समझता हूँ एक inspirational स्टोरी है और
जो हमारे युवा दर्शक है इसको समझेंगे और उसे अपने जीवन में भी
अपनाएंगे। कई बार ये नहीं होता है कि हमें सफलता किसी दूसरी की
स्टोरी को एज इट इज कॉपी कर लें.उसको आप अपने ढंग से जिएं और देखें कि कब, कहाँ और कैसे किस व्यक्ति ने संघर्ष के दौरान अपना
जीवन जीया था और उसने कैसे अपनी हिम्मत रखी थी. मैं समझता हूँ वो
उसको हौसला देती है. बहुत-बहुत धन्यवाद और आशा करता हूँ जिस तरह
से आपने कहा अपनी एनजीओ के माध्यम से आस आशा और आस दोनों एक
दूसरे के पूरक से हैं. तो उसे भी जो आप अपने समाज के लिए, अपनी
सोसाइटी के जो कह रहे हैं कि बेसिकली वो मेरे लिए है वो
करेंगे तो समाज को तो कम से कम फायदा पहुंचेगा ही और आप जैसे ही
लोग जीवन में आगे आते रहें समाज में आगे आते रहें और समाज को अगर

आगे बढ़ाते रहेंगे तो मैं समझता  हूँ एक ना एक दिन हर तरफ खुशियां
ही खुशियां तो दोस्तों जिस तरह से वीरेंद्र जी ने कहा कि बड़ी
खुशी के लिए छोटी खुशियों को नजर अंदाज ना करें यानि कि जब आप
लंबी दूरी तय करना चाहते हैं हजार किलोमीटर बारह सौ किलोमीटर
की तो बीच-बीच में छोटे-छोटे ढाबे आते हैं, चाय की दुकानें
आती हैं तो चाय पीते हुए, खाते हुए, खुशियां मनाते हुए आप अपनी
मंजिल तक पहुंचे क्योंकि एक साथ अगर पहुंचना चाहेंगे एक ही बार
में तो थक जाएंगे, निराश हो जाएंगे, समस्याएं आ सकती हैं और
गाड़ी का इंजन भी गर्म हो के बंद हो सकता है, तो ऐसा ना करें, को
ये program कैसा लगा? आगे इस कार्यक्रम में या इस तरह के
कार्यक्रम में आप किस तरह कीहस्तियों से मिलना चाहते हैं, ये
आप comment box में लिखें और साथ

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करें, धन्यवाद, नमस्ते।

 

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