
दुनिया के बाज़ार चढ़े, भारत क्यों फिसला? AI, अमेरिकी चुनाव और आपकी EMI | 27 अक्टूबर 2026
इस साल दुनिया के ज़्यादातर बड़े stock market ऊपर हैं, जबकि भारत का Nifty अब तक करीब 13% नीचे है। SanjeevniTV के कार्यक्रम “देश, दुनिया और पैसा” की यह रिपोर्ट इस फर्क की जड़ तक जाती है: दुनिया के बाज़ार किस इंजन पर चढ़े, भारत उससे बाहर क्यों रहा, और अमेरिका का midterm चुनाव व Fed का फैसला इस फर्क को कैसे बदल सकते हैं। (यह लेख episode की मुख्य बातों पर आधारित है।)
मुख्य बातें
- दुनिया की तेज़ी लगभग एक ही कहानी पर टिकी थी: AI की मशीनें। सितंबर के आखिर तक Taiwan करीब 66% और Korea करीब 62% चढ़ चुके थे।
- भारत के पीछे रहने की पाँच वजहें: AI hardware में कम भागीदारी, महँगा valuation, कमज़ोर rupee, ऊँचे interest rates और IPO की बाढ़।
- Economy कमज़ोर नहीं है; RBI इस साल करीब 7% growth आंक रहा है। Economy और stock market हमेशा साथ नहीं चलते।
- अक्टूबर में AI दौड़ को झटका लगा: Korea सबसे तेज़ फिसला, भारत लगभग टिका रहा।
- अमेरिका का चुनाव भारत तक चार रास्तों से पहुँचता है: dollar और EMI, व्यापार, भारतीय professionals और remittances।
दुनिया किस इंजन पर चढ़ी
AI चलाने के लिए बड़े data centres, हज़ारों ताकतवर chips, memory और बिजली के उपकरण चाहिए, और ये chips ज़्यादातर Taiwan, South Korea और Japan में बनती हैं। अमेरिका की बड़ी technology companies इन पर हर साल सैकड़ों अरब डॉलर खर्च कर रही हैं, और उन्हें सामान बेचने वालों की कमाई कई गुना बढ़ गई है। दुनिया का पैसा सीधा हिसाब लगा रहा था: जहाँ AI की फैक्ट्री है, वहाँ पैसा लगाओ।
इसे शादियों के सीज़न की तरह समझिए। Tent वाले, हलवाई और बैंड वालों की कमाई बढ़ती है, लेकिन किताबों की दुकान को उस सीज़न से बहुत फायदा नहीं होता। इस साल दुनिया में AI का सीज़न चला, और भारत की दुकान कुछ और बेच रही थी: IT services, banks और घरेलू खपत।
भारत पीछे क्यों रहा: पाँच वजहें
पहली, advanced chips और memory बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी companies भारत के stock market में नहीं हैं। दूसरी, भारत सालों तक emerging markets का favourite रहा और विदेशी investors ने उसके shares के लिए ज़्यादा कीमत चुकाई; इतनी गिरावट के बाद भी भारत premium पर है। भारत की listed companies में foreign investors की हिस्सेदारी कई सालों के सबसे निचले स्तर पर है।
तीसरी वजह rupee है। Share की कीमत अपनी जगह रहे और rupee कमज़ोर हो, तो dollar में विदेशी investor का पैसा घट जाता है। इस साल rupee 95 प्रति dollar के आसपास पहुँचा, और energy imports के महँगे बिल ने दबाव बढ़ाया। चौथी, दुनिया भर में interest rates ऊँचे हैं; अमेरिका में सरकारी bond पर ही अच्छा सुरक्षित return मिल रहा है, और RBI ने भी इसी महीने rate बढ़ाया। पाँचवीं, बड़े IPO की बाढ़, जो बाज़ार से पैसा खींचती है।
इन वजहों का नतीजा यह रहा कि foreign investors ने इस साल करीब 3 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए। लेकिन इनमें से किसी वजह का मतलब यह नहीं कि economy कमज़ोर हुई। Economy बताती है कि देश में कितना काम हो रहा है; stock market बताता है कि investors उस काम की आज कितनी कीमत देने को तैयार हैं।
अक्टूबर का पलटा: कमज़ोरी या ढाल?
अक्टूबर में AI दौड़ को झटका लगा। जो Korea सबसे तेज़ भागा था, वही इस महीने सबसे तेज़ फिसला, जबकि भारत लगभग अपनी जगह टिका रहा। जो बाज़ार एक ही कहानी पर टिका हो, वह कहानी हिलते ही पूरा हिल जाता है।
फिर भी इतनी जल्दी यह मान लेना ठीक नहीं कि भारत की कमज़ोरी उसकी ढाल थी। भारत इसलिए टिका क्योंकि वह उस दांव में शामिल ही नहीं था जो हिला। और उसे और गहरी गिरावट से बचाया देश के अपने पैसे ने: SIP, mutual funds और आम भारतीय investor।
अमेरिका का “महँगाई वाला चुनाव”
3 नवंबर के midterm चुनाव में President नहीं, बल्कि Congress का नियंत्रण तय होता है, और इस बार रोज़मर्रा का खर्च बहस के केंद्र में है। Urban Institute के हिसाब से पिछले साल जनवरी से अब तक वहाँ petrol का राष्ट्रीय औसत दाम करीब एक-तिहाई बढ़ा, जबकि औसत कमाई करीब 6%। Reuters/Ipsos सर्वे में हर चार में से तीन मतदाता मानते हैं कि उनका रहन-सहन का खर्च गलत दिशा में जा रहा है, जबकि White House का कहना है कि उसकी नीतियाँ economy को मज़बूत कर रही हैं।
एक ज़रूरी बात: महँगाई की दर कम होने का मतलब कीमतें घटना नहीं, बस धीमी रफ्तार से बढ़ना है। आम आदमी को राहत तभी लगती है जब कमाई कीमतों से आगे निकले। अगर संसद एक पार्टी के हाथ में और President दूसरी पार्टी के हों, तो सरकारी खर्च, कर्ज़ की सीमा और budget पर खींचतान बढ़ सकती है, जिससे दुनिया के bond market घबराते हैं।
भारत तक चार रास्ते
पहला, dollar और आपकी EMI: अमेरिका में rates ऊँचे रहें तो पैसा वहाँ खिंचता है, rupee पर दबाव आता है, आयातित चीज़ें महँगी होती हैं, और RBI के लिए rate घटाने की गुंजाइश कम हो सकती है। RBI की अगली बैठक 2 से 4 दिसंबर को है, यानी Fed के अगले कदम से पहले। दूसरा, व्यापार: वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal के मुताबिक trade deal की ज़्यादातर बातचीत पूरी है, लेकिन दस्तख़त नहीं हुए। Tariffs ज़्यादातर President के executive फैसलों से तय होते रहे हैं, इसलिए संसद बदलने से नीति रातों-रात नहीं बदलेगी।
तीसरा, भारतीय professionals: नए H-1B visa पर एक लाख डॉलर की fee की वसूली अदालत के आदेश से रुकी है, लेकिन सरकार की अपील बाकी है। IT companies की कमाई का बड़ा हिस्सा अमेरिकी clients से आता है। चौथा, remittances: इस साल जनवरी से अमेरिका में नकद भेजे जाने वाले पैसे पर 1% tax है, लेकिन bank account या bank card से भेजा पैसा इससे बाहर है।
पैसे की चाल में सोना भी दिलचस्प है: करीब 4,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास, जनवरी के record से काफी नीचे, क्योंकि ऊँचे rates और मज़बूत dollar में बिना ब्याज वाला सोना रखने का नुकसान बढ़ता है। भारत में कमज़ोर rupee की वजह से सोना उतना नहीं गिरा जितना dollar में।
आगे किन बातों पर नज़र रखें
- Fed का फैसला और Chairman Kevin Warsh का सुर: दिसंबर में बढ़ोतरी का साफ इशारा dollar को मज़बूत और rupee पर दबाव बढ़ा सकता है।
- Microsoft, Alphabet और Amazon के results, जो बताएँगे कि AI दौड़ फिर रफ्तार पकड़ती है या अक्टूबर का झटका गहराता है।
- अमेरिका का PCE महँगाई आंकड़ा और Bank of Japan का फैसला।
- 3 नवंबर के चुनाव नतीजे, और foreign investors की बिकवाली थमने व rupee में स्थिरता के संकेत।
सबसे बड़ी सीख: किसी बाज़ार का पीछे रह जाना हमेशा कमज़ोरी नहीं होता, और तेज़ दौड़ हमेशा मज़बूती नहीं। असली सवाल यह है कि दौड़ किस कहानी पर टिकी है। और घर के बजट में भी कमाई बढ़ने का एहसास देर से होता है, खर्च बढ़ने का तुरंत।
स्रोत: RBI; वाणिज्य मंत्रालय; अमेरिकी Federal Reserve; Urban Institute; Reuters/Ipsos सर्वे; White House के बयान; depository (NSDL) के FPI आंकड़े; Reuters, CNBC और अन्य वित्तीय मीडिया की रिपोर्टिंग। बाज़ारों के सालाना आंकड़े सितंबर 2026 के आखिर तक के, बाकी 27 अक्टूबर 2026 तक के हैं।
यह लेख सिर्फ जानकारी और समझ के लिए है। यह निवेश की सलाह नहीं है।
