
गाज़ा में हमास निरस्त्रीकरण समझौता: ट्रम्प का बड़ा ऐलान, इज़रायल की वापसी शुरू!
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने Truth Social अकाउंट पर पोस्ट करते हुए ऐलान किया है कि उनके “गाज़ा बोर्ड ऑफ पीस” ने हमास और गाज़ा में मौजूद बाकी सशस्त्र गुटों के निरस्त्रीकरण को लेकर एक बड़ा समझौता कर लिया है। ट्रम्प ने इसे अपने 20-पॉइंट गाज़ा प्लान की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है, जिसके तहत इज़रायली सेना अब गाज़ा से चरणबद्ध तरीके से वापसी करेगी। हालांकि, इसी बीच ईरान के मोर्चे पर तनाव अभी भी बना हुआ है, जहां अमेरिकी और ईरानी सेनाओं के बीच हमले-जवाबी हमले का सिलसिला जारी है।
हमास निरस्त्रीकरण समझौते में क्या तय हुआ है?
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, गाज़ा बोर्ड ऑफ पीस की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत हमास अपने हथियार इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स को सौंपेगा। इसके लिए गाज़ा में अलग-अलग ज़ोन तय किए जाएंगे, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से हथियार-मुक्त किया जाएगा। एक स्वतंत्र निकाय हर चरण के पूरा होने की पुष्टि करेगा, उसके बाद ही अगला चरण शुरू होगा।
इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स की कमान एक अमेरिकी जनरल के हाथ में होगी, और शुरुआती अनुमान के मुताबिक इसमें करीब 5,000 सैनिक शामिल होंगे। यह फोर्स तीन मुख्य ज़िम्मेदारियां निभाएगी:
- नई फिलिस्तीनी पुलिस फोर्स को ट्रेनिंग देना
- इज़रायली सेना और गाज़ा की आम जनता के बीच बफर के तौर पर तैनाती
- हथियार-मुक्ति की निगरानी, जिसमें गाज़ा के विस्तृत सुरंग नेटवर्क को खत्म करना भी शामिल है
अधिकारियों के मुताबिक पूरी निरस्त्रीकरण प्रक्रिया में करीब 200 से 300 दिन तक का समय लग सकता है।
ट्रम्प ने Truth Social पर क्या लिखा?
ट्रम्प ने अपने Truth Social पोस्ट में इस समझौते को गाज़ा में स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर बताया। उन्होंने लिखा कि गाज़ा अब एक नई फिलिस्तीनी सरकार के हाथों में होगा, जो अपने लोगों के लिए काम करेगी, जबकि इज़रायल को यह भरोसा मिलेगा कि गाज़ा भविष्य में आतंकी गतिविधियों का अड्डा नहीं बनेगा। पोस्ट में ट्रम्प ने इसके लिए मिस्र, क़तर और तुर्की जैसे मध्यस्थ देशों और अपनी टीम को धन्यवाद भी दिया।
हमास डेलिगेशन के एक सदस्य ने अल जज़ीरा से बातचीत में स्पष्ट किया कि पूरा क्रियान्वयन इस शर्त पर निर्भर करेगा कि इज़रायल भी अपने हिस्से की प्रतिबद्धताएं पूरी करे।
गाज़ा बोर्ड ऑफ पीस के प्रतिनिधि निकोलाय म्लादेनोव ने कहा कि यह समझौता महीनों की मुश्किल बातचीत के बाद संभव हो पाया है, लेकिन असली चुनौती अब क्रियान्वयन और निगरानी की है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 पर लगातार फोकस बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आभार भी जताया।
दूसरी तरफ, ईरान मोर्चे पर तनाव अब भी बरकरार
गाज़ा में शांति की दिशा में प्रगति के बीच, ईरान के मोर्चे पर हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने दावा किया है कि उसने कुवैत, जॉर्डन और बहरीन में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। यह जवाबी कार्रवाई अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के क़ेशम आइलैंड पर किए गए हमले के बाद सामने आई, जिसमें एक परिवार के दंपति और उनके दो साल के बच्चे की मौत हो गई थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक किश आइलैंड, बुशहर और खुज़िस्तान प्रांत के चार अलग-अलग स्थानों पर भी धमाकों की खबरें आईं। ज़ंजान प्रांत में हुए एक अलग अमेरिकी हमले में तीन IRGC सदस्यों की मौत होने की भी खबर है। ईरान की सेना ने यह भी दावा किया कि उसने बहरीन के शेख़ ईसा एयरबेस पर मौजूद अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाया। इसके अलावा, कुवैत के उत्तरी हिस्से में एक चीनी कंपनी की इमारत पर हुए हमले में एक कर्मचारी की जान चली गई।
ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालीबाफ ने क़ेशम आइलैंड पर हुई नागरिकों की मौत पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका को इसकी “कीमत चुकानी होगी”।
क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रिया
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से फोन पर बातचीत कर क्षेत्र में जारी तनाव कम करने के प्रयासों पर चर्चा की। अल-शरा ने सऊदी तेल ठिकानों पर ईरान-समर्थित समूहों द्वारा किए गए हमलों की निंदा की और सऊदी अरब के जवाबी कार्रवाई के अधिकार का समर्थन किया।
इसके अलावा, मिस्र के दमियाता पोर्ट पर ड्रोन हमले से लगी आग को लेकर सऊदी अरब ने काहिरा के प्रति “पूर्ण एकजुटता” जताई। वहीं इराक ने स्पष्ट किया कि ईरान-समर्थित पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन फोर्स के ठिकानों पर हुए हालिया अमेरिका-सऊदी हमलों की उसे पहले से कोई जानकारी नहीं थी।
भारत के लिए इसका मतलब
मिडिल ईस्ट में जारी इस घटनाक्रम का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। अगर गाज़ा समझौता आगे बढ़ता है और क्षेत्र में स्थिरता लौटती है, तो इससे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बना जोखिम कम हो सकता है, जिसका फायदा भारत के आयात बिल और महंगाई पर नियंत्रण के तौर पर मिल सकता है।
वहीं दूसरी तरफ, ईरान मोर्चे पर बना तनाव खाड़ी क्षेत्र में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासी कामगारों की सुरक्षा और वहां से आने वाले प्रेषण (remittances) के लिहाज़ से भी चिंता का विषय बना हुआ है। भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की नज़र इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार बनी हुई है, खासकर खाड़ी देशों में मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर।
आगे क्या?
गाज़ा में निरस्त्रीकरण समझौता क्षेत्र में शांति की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन में होगी। दूसरी ओर, ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव यह संकेत देता है कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता की राह अभी लंबी है। आने वाले दिनों में इज़रायली सेना की वापसी की रफ्तार और इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स की तैनाती पर सभी की नज़र रहेगी।
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स्रोत: अल जज़ीरा की रिपोर्ट और डोनाल्ड ट्रम्प के Truth Social पोस्ट पर आधारित
