
Fed और ECB ने नहीं बढ़ाए Rates, Lagarde का इस्तीफ़ा: राहत या चेतावनी? | 29 अक्टूबर 2026
डॉक्टर ने blood pressure की दवा की dose इस बार नहीं बढ़ाई, लेकिन साथ में कह दिया कि अगली report ठीक न आई तो बढ़ानी पड़ेगी। यह राहत है या चेतावनी? 29 अक्टूबर 2026 को अमेरिका के Federal Reserve के बाद यूरोप के ECB ने भी interest rate जहाँ था वहीं रखा, और उसी दिन उसकी अध्यक्ष Christine Lagarde ने समय से पहले पद छोड़ने का ऐलान कर दिया। SanjeevniTV के कार्यक्रम “देश, दुनिया और पैसा” की इस रिपोर्ट में पढ़िए कि यह ठहराव भारत, RBI और आपकी EMI के लिए क्या मतलब रखता है।
मुख्य बातें
- ECB ने deposit rate 2.5% पर रखा, जबकि यूरोप में महँगाई करीब 3.8% है।
- Christine Lagarde 7 फरवरी 2027 को पद छोड़ेंगी, कार्यकाल पूरा होने से करीब आठ महीने पहले।
- अमेरिका की GDP जुलाई-सितंबर में 3.4% (सालाना दर) बढ़ी; PCE महँगाई सितंबर में 3.6% पर।
- भारत में सितंबर का credit card खर्च पिछले साल से करीब 6% घटा, फरवरी 2021 के बाद पहली गिरावट।
- केंद्र सरकार ने DA 3% बढ़ाया, करीब 48 लाख कर्मचारियों और 68 लाख pensioners को फायदा।
यूरोप: ठहराव, और driver का बदलना
यूरोप में महँगाई ECB के 2% लक्ष्य से लगभग दोगुनी है, और ECB इस साल दो बार rate बढ़ा चुका है। फिर भी वह रुका, क्योंकि France जैसे देशों के सरकारी उधार पर ब्याज तेज़ी से चढ़ा है और पूरे यूरोप में लंबे कर्ज़ की लागत बढ़ी है। जैसे गाड़ी चलाते हुए सामने चढ़ाई आ जाए तो वह खुद धीमी हो जाती है और brake दबाने की ज़रूरत नहीं रहती, वैसे ही bond market की यह चढ़ाई वही काम कर रही है जो rate बढ़ाकर ECB करता। साथ ही rate बढ़ाने से energy सस्ती नहीं होती; यह हथियार माँग ठंडी करता है, supply की कमी पूरी नहीं करता।
सबसे बड़ी खबर Lagarde का ऐलान रही। उनकी जगह कौन आएगा, यह अभी तय नहीं है, और यह फैसला यूरोप की राजनीति का भी है। Euro dollar के मुकाबले मई के बाद के निचले स्तर तक फिसला। यूरोप भारत के सबसे बड़े export बाज़ारों में से एक है, इसलिए Frankfurt का यह बदलाव सिर्फ यूरोप की कहानी नहीं है।
अमेरिका की “अगली report” राहत वाली नहीं निकली
Fed के फैसले में दो सदस्य असहमत थे, और वे rate घटाना नहीं, बढ़ाना चाहते थे। Fed ने अमेरिकी economy को “मज़बूत रफ्तार” वाली भी बताया। अगले ही दिन आंकड़े आए: जुलाई-सितंबर में GDP 3.4% की सालाना रफ्तार से बढ़ी, और Fed का पसंदीदा महँगाई पैमाना PCE सितंबर में 3.6% हो गया, जबकि core PCE 3.1% रहा। CNBC के मुताबिक CME FedWatch के आंकड़ों में traders दिसंबर में rate बढ़ने की संभावना करीब पाँच में से चार मान रहे हैं, हालाँकि यह बाज़ार का अंदाज़ा है, Fed का फैसला नहीं।
अमेरिका में लंबे उधार की कीमत दस साल के सरकारी bond से तय होती है, जो करीब पाँच प्रतिशत पर टिका है। यानी rate न बढ़ने के बावजूद उधार सस्ता नहीं हुआ। दुनिया के पैसे की मंडी में अमेरिका की दुकान पर “तेज़ economy” और “ऊँचा ब्याज” के बोर्ड लगे हैं, और भारत को इसी भीड़ में अपने ग्राहक खींचने हैं।
भारत: त्योहार से पहले आपकी जेब
Business Standard की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर में credit card खर्च करीब दो लाख करोड़ रुपये रहा, पिछले साल से करीब 6% कम। लेकिन पिछले साल सितंबर में GST दरें घटी थीं और online sale जल्दी शुरू हुई थी, जबकि इस बार sale अक्टूबर में आई। अंदर के आंकड़े भी यही बताते हैं: online खर्च करीब 12% घटा, लेकिन दुकानों पर card swipe से खर्च करीब 7% बढ़ा। CareEdge का अनुमान है कि अक्टूबर में card खर्च फिर तेज़ी से बढ़ेगा, हालाँकि ऊँची कीमतें और RBI का rate hike त्योहार के खर्च पर दबाव डाल सकते हैं।
केंद्र सरकार ने महँगाई भत्ता 3% बढ़ाया है, जिससे सरकार पर साल में दस हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का बोझ आएगा। लेकिन देश के ज़्यादातर कामगार निजी नौकरी या अपने धंधे में हैं, जिन्हें महँगाई का ऐसा मुआवज़ा अपने-आप नहीं मिलता। वित्त मंत्रालय ने इस साल की growth करीब 7.3% आंकी है, पर महँगाई के जोखिम भी गिनाए। जब growth अच्छी हो और महँगाई ज़िद्दी, तो RBI के पास rate घटाने की गुंजाइश कम रहती है, इसलिए home loan की EMI में राहत का इंतज़ार लंबा हो सकता है। FD वालों के लिए ऊँचा ब्याज अच्छा है, लेकिन असली कमाई वह है जो ब्याज में से महँगाई घटाने के बाद बचे।
पैसा कहाँ जा रहा है?
Lagarde की खबर के बाद पैसे ने euro से कदम पीछे खींचे, और चूँकि dollar index में euro का सबसे बड़ा हिस्सा है, dollar अपने-आप मज़बूत दिखा। PTI के मुताबिक rupee दिन में करीब दो हफ्ते के निचले स्तर तक फिसला, लेकिन संभलकर 95 के आसपास बंद हुआ। Gold पर भी दबाव दिखा, क्योंकि gold कोई ब्याज नहीं देता, और जब ब्याज ऊँचा रहने की उम्मीद बढ़ती है तो उसे रखने की छिपी कीमत बढ़ जाती है। पैसा डर से नहीं, हिसाब से चल रहा है।
आगे किन बातों पर नज़र रखें
- Bank of Japan का फैसला: सस्ते उधार का एक और रास्ता सिकुड़ सकता है।
- अमेरिका की अगली महँगाई रिपोर्ट, जो दिसंबर में Fed के कदम की दिशा तय करेगी।
- 3 नवंबर के अमेरिकी midterm चुनाव, और सरकारी खर्च-कर्ज़ की बहस पर उनका असर।
- Lagarde की जगह कौन आता है, और कब।
- दिसंबर की शुरुआत में RBI की बैठक, उससे पहले अक्टूबर की महँगाई, rupee और forex reserves।
सबसे बड़ी सीख: ठहराव सोचने का वक्त होता है, बेफ़िक्र होने का नहीं। केंद्रीय बैंक रुके हैं, लेकिन उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला।
स्रोत: European Central Bank का फैसला और Christine Lagarde की press conference (29 अक्टूबर 2026); अमेरिकी Federal Reserve का बयान; अमेरिका के GDP और PCE आंकड़े; CNBC (CME FedWatch); Reuters, PTI और Business Standard की रिपोर्टिंग; CareEdge; भारत सरकार का DA फैसला; वित्त मंत्रालय की मासिक review। आंकड़े 29 अक्टूबर 2026 तक के हैं।
यह लेख सिर्फ जानकारी और समझ के लिए है। यह निवेश की सलाह नहीं है।
