मुफ्तखोरी की संस्कृति: दिल्ली के पर्यावरण और समाज के लिए एक गंभीर खतरा ​डा. अंजुलिका जोशी

मुफ्तखोरी की संस्कृति: दिल्ली के पर्यावरण और समाज के लिए एक गंभीर खतरा ​डा. अंजुलिका जोशी

​आज दिल्ली जिन दो सबसे बड़ी समस्याओं से जूझ रही है, वे हैं—प्रदूषण और गिरती हुई सामाजिक जवाबदेही। हालाँकि, इन दोनों के मूल में एक ही कारण छिपा है: ‘मुफ्त सुविधाओं की राजनीति’ (Freebie Culture)। जब सरकारें बिना किसी शर्त के संसाधन बांटती हैं, तो न केवल अर्थव्यवस्था चरमराती है, बल्कि नागरिकों के चरित्र और पर्यावरण पर भी इसका गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है।

नीतियों का विरोधाभास: मंशा बनाम हकीकत

प्रदूषण कम करने के नाम पर महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर सब्सिडी जैसी योजनाएं लाई गईं। सिद्धांत रूप में यह सही लग सकता है, लेकिन धरातल पर यह विफल है। मुफ्त यात्रा के कारण बसों में अत्यधिक भीड़ रहती है, जिससे संपन्न वर्ग सार्वजनिक परिवहन छोड़कर वापस निजी वाहनों की ओर मुड़ जाता है।
ईवी सब्सिडी का लाभ मध्यम और उच्च वर्ग उठा रहा है, जिससे सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ रही है। जो पर्यावरण के लिए किसी भी तरह ठीक नहीं ठहराया जा सकता है।

​मुफ्त राशन और आत्मनिर्भरता का संकट
पर्यावरण के साथ-साथ सामाजिक ढांचा भी प्रभावित हो रहा है। वंचित वर्गों को मुफ्त राशन देना एक मानवीय पहल हो सकती है, लेकिन जब यह स्थायी व्यवस्था बन जाती है, तो यह ‘आलस्य’ और ‘नागरिक बोध की कमी’ को जन्म देती है। यह लोगों को काम करने से रोकती है और उन्हें सरकार पर निर्भर बना देती है। भ्रष्टाचार इस तंत्र की एक और कड़वी सच्चाई है, जहाँ जरुरतमंद लोगों के बजाय बिचौलिये फायदा उठाते हैं।
​हमें चीन जैसे देशों से सीखने की ज़रूरत है, जिन्होंने पिछले दो दशकों (लगभग 20 वर्षों) में कड़ी मेहनत और अनिवार्य रोज़गार नीतियों के माध्यम से खुद को ‘भिखारी मुक्त’ और ‘अत्यधिक गरीबी मुक्त’ बनाने में बड़ी सफलता हासिल की है। वहां ‘मुफ्त’ के बजाय ‘काम के बदले अधिकार’ की नीति अपनाई गई। भारत में भी भीख मांगने को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाना चाहिए और उसकी जगह अनिवार्य रोज़गार (Mandatory Work) सृजित करने चाहिए।
​प्राथमिकता का बदलाव: शिक्षा और स्वास्थ्य ही हों ‘निशुल्क’

यदि सरकार को कुछ मुफ्त देना ही है, तो वह केवल विश्व स्तरीय शिक्षा और बेहतरीन चिकित्सा सुविधाएं होनी चाहिए। ये दो ऐसे क्षेत्र हैं जो व्यक्ति को लाचार नहीं, बल्कि सशक्त बनाते हैं। एक शिक्षित और स्वस्थ नागरिक की सोच सकारात्मक और जिम्मेदार होती है। जब व्यक्ति शिक्षित होगा, तभी वह पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनेगा और प्रदूषण जैसी वैश्विक समस्याओं के समाधान में अपना योगदान देगा।

दिल्ली को आज मुफ्त रेवड़ियों की नहीं, बल्कि संसाधनों के प्रति सम्मान और जवाबदेह नागरिकता की ज़रूरत है। जो पैसा मुफ्त की योजनाओं में व्यर्थ हो रहा है, उसे ‘स्मॉग टावर’, ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ और आधुनिक कचरा प्रबंधन में लगाया जाना चाहिए। सरकार को लोगों को ‘उपभोक्ता’ नहीं, बल्कि ‘कर्मयोगी’ बनाना चाहिए। याद रखें, हवा साफ़ करने के लिए केवल नियमों की नहीं, बल्कि एक जागरूक और आत्मनिर्भर समाज की आवश्यकता है।

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