
विकास या विनाश का चक्र: आखिर कब थमेगी जनता के पैसों और पर्यावरण की बर्बादी? – डा. अंजुलिका जोशी
हमारे देश में एक कहावत मशहूर हो चली है— “अगर सड़क चकाचक बन गई है, तो समझ लीजिए कि अगले हफ्ते नाला खोदने वाली मशीन आने वाली है।” सुनने में यह व्यंग्य लगता है, लेकिन यह उन करोड़ों करदाताओं की कड़वी हकीकत है, जिनकी मेहनत की कमाई को ‘नियोजन’ (Planning) के नाम पर मिट्टी में मिला दिया जाता है।
कुप्रबंधन या सोची-समझी साज़िश?
किसी भी विकसित देश में बुनियादी ढांचे का निर्माण एक एकीकृत ब्लूप्रिंट के तहत होता है। लेकिन भारत में स्थिति इसके उलट है। पहले एक शानदार डामर की सड़क बिछाई जाती है। जनता खुश होती है कि अब गड्ढों से निजात मिलेगी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद जल निगम आता है और पाइप डालने के लिए सड़क चीर देता है। फिर उसे आनन-फानन में भरा जाता है, तो नगर निगम को नाले की याद आ जाती है।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विभिन्न सरकारी विभागों (PWD, बिजली विभाग, जल बोर्ड) के बीच कोई संवाद नहीं होता? या फिर यह अधिकारियों और भ्रष्ट ठेकेदारों की मिलीभगत का एक सुनियोजित तरीका है? बार-बार निर्माण और तोड़-फोड़ का मतलब है— बार-बार नए टेंडर, बार-बार बजट का आवंटन और भ्रष्टाचार के लिए नए रास्ते।
जनता पर चौतरफा मार:
इस अव्यवस्था का खामियाजा सिर्फ सरकारी खजाने को ही नहीं, बल्कि आम आदमी को भी भुगतना पड़ता है:
आर्थिक नुकसान: सड़क बनाने में लगने वाला करोड़ों का टैक्स सीधे तौर पर बर्बाद होता है।
स्वास्थ्य संकट: लगातार खुदाई से उड़ने वाली धूल और प्रदूषण फेफड़ों की बीमारियों का कारण बन रहे हैं।
दुर्घटनाएं: अधूरे छोड़े गए गड्ढे और ऊबड़-खाबड़ सड़कें आए दिन जानलेवा हादसों को न्योता देती हैं।
समय की बर्बादी: बार-बार लगने वाले ट्रैफिक जाम से देश की उत्पादकता घटती है।
पर्यावरण पर प्रहार: विकास के नाम पर जहरीली होती हवा
सड़क को बार-बार तोड़ने और बनाने की प्रक्रिया केवल पैसों की बर्बादी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के साथ भी खिलवाड़ है। इसके दुष्परिणाम भयावह हैं:
धूल और पीएम 2.5 का कहर: जब एक बनी-बनाई सड़क को खोदा जाता है, तो उससे निकलने वाली धूल (Silt) हवा में घुल जाती है। यह वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ा कर ‘गंभीर’ श्रेणी में ले जाता है, जिससे दमा और हृदय रोग जैसी बीमारियाँ घर-घर की कहानी बन गई हैं।
कंस्ट्रक्शन वेस्ट (C&D Waste): हर बार सड़क टूटने पर टनों मलबा निकलता है। यह मलबा या तो अवैध रूप से खाली मैदानों में फेंका जाता है या हमारे लैंडफिल्स (Landfills) पर बोझ बढ़ाता है, जिससे कचरे के ऊँचे पहाड़ खड़े हो रहे हैं।
संसाधनों और जनशक्ति की बर्बादी: एक सड़क बनाने में भारी मात्रा में पत्थर, डामर (Bitumen), पानी और ईंधन का उपयोग होता है। 15 दिन बाद सड़क तोड़ देने से ये सारे प्राकृतिक संसाधन शून्य हो जाते हैं। यह प्रकृति और हजारों मजदूरों की मेहनत का अपमान है।
कार्बन फुटप्रिंट: निर्माण मशीनों और भारी ट्रकों का बार-बार परिचालन कार्बन उत्सर्जन बढ़ाता है, जो सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है।
समाधान: जवाबदेही तय करना ज़रूरी
अब समय आ गया है कि जनता इस तमाशे पर खामोश रहने के बजाय सवाल पूछे।
समाधान के लिए कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:
सिंगल विंडो क्लीयरेंस: किसी भी सड़क निर्माण से पहले सभी संबंधित विभागों (गैस, पानी, बिजली, इंटरनेट) से एनओसी लेना अनिवार्य हो।
यूटिलिटी डक्ट (Utility Ducts): सड़कों के नीचे स्थायी पाइपलाइनों और केबल के लिए पहले से जगह छोड़ी जाए ताकि भविष्य में खुदाई की नौबत न आए।
जवाबदेही और जुर्माना:
अगर सड़क बनने के एक साल के भीतर उसे बिना किसी आपात स्थिति के खोदा जाता है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर भारी जुर्माना लगना चाहिए।
निष्कर्ष
सड़कें देश की जीवन रेखा होती हैं, लेकिन इन्हें ‘लूट का जरिया’ बना देना लोकतंत्र का अपमान है। अगर भारत को वास्तव में ‘विकसित’ होना है, तो हमें अपनी कार्यशैली को भी विकसित करना होगा। जनता के खून-पसीने की कमाई को भ्रष्टाचार के गड्ढों में भरने और पर्यावरण को सूली पर चढ़ाने का यह सिलसिला अब बंद होना चाहिए।
