पॉलीथीन से भी खतरनाक ‘चमकदार’ कचरा: क्या हम अनजाने में जहर फैला रहे हैं?

पॉलीथीन से भी खतरनाक ‘चमकदार’ कचरा: क्या हम अनजाने में जहर फैला रहे हैं? – डॉ. अंजुलिका जोशी

वर्षों से पर्यावरण संरक्षण के आंदोलनों में पॉलीथीन बैग को ही मुख्य ‘खलनायक’ माना गया है। हम गर्व के साथ कपड़े के थैले लेकर बाजार जाते हैं और यह मान लेते हैं कि पर्यावरण की जंग जीती जा रही है। बेशक, पतली पॉलीथीन पर प्रतिबंध एक सराहनीय कदम था, लेकिन इसने हमारी सामूहिक चेतना में एक ‘ब्लाइंड स्पॉट’ (अंध बिंदु) पैदा कर दिया है। हम कैरी बैग्स पर इतने केंद्रित हो गए हैं कि हमने अपनी रसोई, बाथरूम और जेबों में जगह बनाए बैठे अन्य ‘सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ की उस विशाल सेना को नजरअंदाज कर दिया है, जो पॉलीथीन से भी कहीं अधिक घातक है।
पर्दे के पीछे प्रदूषकों की एक शांत लेकिन बेहद जिद्दी फौज बढ़ रही है—ये हैं हमारे स्नैक्स, बिस्किट पान मसाले और शैम्पू, के ‘चमकदार’ रैपर्स।

मल्टी-लेयर्ड प्लास्टिक (MLP): रिसाइकिलिंग का भ्रम
ज्यादातर उपभोक्ता यह मानते हैं कि यदि कोई चीज़ प्लास्टिक जैसी दिखती है, तो उसे रिसाइकिल (पुनर्चक्रित) किया जा सकता है। यह एक उनकी जबरदस्त गलतफहमी है। आपके चिप्स या बिस्किट के पैकेट के अंदर की वह चमकदार चांदी जैसी परत दरअसल पॉलिएस्टर, पॉलीथीन और एल्युमीनियम की एक ‘हाई-टेक सैंडविच’ है।
उद्योग की भाषा में इसे मल्टी-लेयर्ड प्लास्टिक (MLP) कहा जाता है। चूंकि ये परतें आणविक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, इसलिए इन्हें अलग करना या एक साथ पिघलाना नामुमकिन है। नतीजा यह है कि जहाँ एक प्लास्टिक की बोतल को पिघलाकर बेंच या टी-शर्ट बनाई जा सकती है, वहीं ये चमकदार रैपर्स हमेशा के लिए कचरे के ढेर का हिस्सा बन जाते हैं।
हमारे दैनिक जीवन के ‘अदृश्य’ अपराधी
खाद्य पैकेजिंग के अलावा, हमारी दिनचर्या में कई ऐसे प्लास्टिक छिपे हैं जिनसे हम बेखबर हैं:
क्लिंग रैप: खाने को ढकने वाली यह पतली पन्नी कभी रिसाइकिल नहीं होती। यह जमीन में जहरीले ‘डाइऑक्सिन’ (dioxins) छोड़ती है।

सिगरेट के फिल्टर: कई लोग इन्हें कागज या कपास मानते हैं, जबकि ये सेलुलोज एसीटेट (एक प्रकार का प्लास्टिक) से बने होते हैं। एक सिगरेट का फिल्टर समुद्र में 15 साल तक निकोटीन और भारी धातुएं घोलता रहता है।

टी-बैग्स: कई प्रीमियम टी-बैग्स में नायलॉन या PET प्लास्टिक होता है। गरम पानी में उबलते ही ये लाखों की संख्या में माइक्रोप्लास्टिक सीधे आपके कप में छोड़ देते हैं।

व्यक्तिगत देखभाल: ईयर बड्स की प्लास्टिक डंडियां और ‘फ्लश’ किए जाने वाले वेट वाइप्स (Wet Wipes) अक्सर सीवर सिस्टम को जाम कर देते हैं या वहां से निकाल कर समुद्री जीवों के पेट में पहुंच जाते हैं।
‘सैशे इकोनॉमी’ का बढ़ता खतरा
भारत में ‘पाउच’ या ‘सैशे’ संस्कृति का पैमाना बहुत डरावना है। रोजाना करोड़ों की संख्या में शैम्पू, तंबाकू और पान मसाले के पाउच बेचे जाते हैं। इनका आकार इतना छोटा और वजन इतना कम होता है कि कचरा बीनने वाले इन्हें नहीं उठाते, क्योंकि इनका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है।
‘हिमालयन क्लीनअप’ जैसी रिपोर्ट्स बताती हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में पाए जाने वाले कचरे में 80% हिस्सा स्नैक्स और खाद्य पैकेजिंग का होता है जो हमारे इकोसिस्टम के लिए बहुत हानिकारक हैं। जब ये पाउच हमारी नालियों को जाम कर ‘कृत्रिम बाढ़’ नहीं ला रहे होते, तब इन्हें सड़कों के किनारे जला दिया जाता है। यह सिर्फ आग नहीं, बल्कि एक रासायनिक क्रिया है जो हवा में डाइऑक्सिन, फ्यूरान और मरकरी जैसी कैंसरकारी गैसें छोड़ती है।

हिमालयन क्लीनअप रिपोर्ट जैसी हाल की स्टडीज़ से पता चलता है कि खाने और नाश्ते की पैकेजिंग अब सेंसिटिव इकोसिस्टम में कुल प्लास्टिक कचरे का लगभग 80% हिस्सा है। यह कचरा या तो हमारी नालियों को जाम कर देता है, जिससे मानसून के दौरान ”कृत्रिम बाढ़’ आ जाती है, या यह हमारी नदियों में बह जाता है, और आखिर में हमारे समुद्रों को ज़हरीला बना देता है। अगर ये रैपर पानी में नहीं बहते हैं तो इनको अक्सर एकत्र करके जला दिया जाता है। इससे सिर्फ आग ही नहीं लगती , बल्कि यह एक रासायनिक क्रिया है जो हवा में डाइऑक्सिन, फ्यूरान और मरकरी जैसी कैंसरकारी गैसें छोड़ती है।

समाधान की राह: पारदर्शिता की मांग

हम इन प्लास्टिक के खत्म होने का इंतज़ार नहीं कर सकते; ये खत्म नहीं होंगे। ये सिर्फ़ माइक्रोप्लास्टिक में टूटेंगे जो आखिर में हमारी फ़ूड चेन में शामिल हो जाएँगे। इसके समाधान के लिए हमें व्यवस्था में बदलाव लाने की जरूरत है:
• विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) : कंपनियों को उनके कचरे के संग्रह और निस्तारण के लिए जवाबदेह बनाया जाए।
• नागरिक जागरूकता: हमें पाउच के बजाय ‘फैमिली पैक’ खरीदने और बी-वैक्स रैप, धातु के ढक्कन या लकड़ी के ब्रश जैसे विकल्पों को अपनाना होगा।

पल्लव ग्रीन फाउंडेशन का सुझाव
• पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय पल्लव ग्रीन फाउंडेशन यह मांग करता है कि सरकार को उत्पादकों के लिए प्लास्टिक पैकेजिंग पर पर्यावरण पर होने वाले घातक परिणामों की चेतावनी लिखनी चाहिए।
जिस तरह सिगरेट के पैकेट पर ‘धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’ लिखा होता है, उसी तरह इन नॉन-रिसाइकिल रैपर्स पर भी अनिवार्य चेतावनी होनी चाहिए: “यह पैकेजिंग रिसाइकिल नहीं हो सकती और प्रकृति के लिए घातक है।”
उत्पाद की ‘एक्सपायरी डेट’ के साथ उसकी ‘पर्यावरणीय लागत’ (Environmental Cost) बताना उपभोक्ता की सोच बदलने के लिए अनिवार्य है। अब समय आ गया है कि हम उस ‘चमकदार जहर’ के लिए उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों को जवाबदेह ठहराएं जिसे हम पीछे छोड़ रहे हैं।

डॉ. अंजुलिका जोशी
निदेशिका :पल्लव ग्रीन फाउंडेशन

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