Bluntly Speaking

क्या न्यायपालिका को भी Oxygen की ज़रूरत है? दुष्यंत दवे का विस्फोटक Inteview

हमारे देश में न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं और कुछ मामलों में तो फ़ैसला भी नहीं आ पाता और वादी या प्रतिवादी या फिर दोनों की ही फ़ैसले के इंतज़ार में मौत हो जाती है, जबकि अंग्रेज़ी में कहा जाता है Justice delayed is Justice denied।
आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जेलों में बंद कुल क़ैदियों में 68.5% तो under trial हैं, आपने शायद ये ख़बर भी पढ़ी हो कुछ समय पहले फ़ैज़ाबाद के जगजीवन राम यादव को १९६८ में एक क़त्ल के मामले में गिरिफ़्तार किया गया था और वो ४० वर्ष जेल में रहा बिना मुक़दमे के जिसे बाद में supreem कोर्ट ने ज़मानत पर रिहा किया | ऐसे में सवाल ये है कि क्या न्यायालय आम और ख़ास को अलग अलग चश्मे से देखता है जब कि क़ानून को अंधा बताया जाता है, न्याय की देवी की आँखों पर काली पट्टी बंधी होती है तो आख़िर कैसे आम और ख़ास में फ़र्क़ करती है न्यायालय, क्या न्यायालय में सरकार का कोई दख़ल होता है और होता है तो कैसे? इन्हीं सब बातों पर Sr॰ Advocate Dushyant Dave, Former President Supreme Court Bar Association से बेबाक़ चर्चा ।

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