
स्मार्ट शहर, अनपढ़ व्यवहार: क्या हम नागरिक बोध खो चुके हैं? हमारी प्रगति पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न— डॉ. अंजुलिका जोशी
आज हम 21वीं सदी के उस दौर में हैं जहाँ शहर ‘स्मार्ट’ हो रहे हैं, सड़कें चौड़ी हो रही हैं और इमारतें आसमान छू रही हैं लेकिन हमारी मानसिता का स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा ह। तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं की इस चकाचौंध के बीच एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है—क्या हमारा ‘नागरिक बोध’ (Civic Sense) कहीं पीछे छूट गया है?
नागरिक बोध वह अदृश्य सामाजिक अनुबंध है जो हमें सिखाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर हमारा व्यवहार दूसरों के लिए कष्टकारी नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से, आज हमारी सड़कों पर होने वाला शोर और गलियों में बिखरा कचरा हमारी सामूहिक विफलताओं की गवाही दे रहा है।
स्मार्ट सिटी तो बन गई, पर हम ‘स्मार्ट नागरिक’ कब बनेंगे?
शोर का जानलेवा जुनून: बेवजह का हॉर्न
सड़क पर निकलते ही हमारा धैर्य जैसे खत्म हो जाता है। ऐसा लगता है मानो हम किसी युद्ध क्षेत्र में हों। लाल बत्ती पर खड़े होकर या ट्रैफिक जाम में फँसकर बेतहाशा हॉर्न बजाना हमारी आदत बन चुकी है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हॉर्न बजाने से न तो सिग्नल हरा होगा और न ही सड़क खाली होगी।
यह ‘ध्वनि प्रदूषण’ केवल एक शोर नहीं, बल्कि मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप और बहरेपन का मुख्य कारण बनता जा रहा है। एम्बुलेंस अस्पतालों और स्कूलों के पास भी हॉर्न बजाने से न चूकना हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। हर कोई अपने गंतव्य स्थान पर जल्दी पहुँचना चाहता है, लेकिन शोर मचाकर रास्ता साफ करने की कोशिश केवल अज्ञानता है।
सड़कें और नालियाँ: हमारी लापरवाही की भेंट
स्वच्छता केवल ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत संस्कार है। कार से चिप्स का पैकेट या प्लास्टिक की बोतल बाहर फेंकना हमें सामान्य लगता है, पर इसके परिणाम भयावह हैं:
जलभराव का संकट: हमारा फैलाया हुआ कचरा बारिश के दौरान नालियों को जाम कर देता है जो जलभराव का कारण बनता है और जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
बेजुबानों पर संकट: सड़कों पर घूमने वाले जानवर अक्सर इन प्लास्टिक के टुकड़ों को खाना समझ कर निगल लेते हैं, जो उनके लिए जानलेवा साबित होता है।
आस्था और पर्यावरण का संतुलन
हमारी नदियाँ संस्कृति का आधार और आस्था का केंद्र हैं। लेकिन उत्सवों के दौरान रासायनिक रंगों और पी.ओ.पी. (POP) से बनी मूर्तियों का विसर्जन उन्हें ‘ज़हर’ में बदल रहा है। यह विडंबना ही है कि हम जिस नदी को पूजते हैं, उसे ही प्रदूषित करने में संकोच नहीं करते। सच्ची श्रद्धा वह है जो प्रकृति की शुद्धता को बनाए रखे। आधुनिक नागरिक बोध माँग करता है कि हम पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को ही चुनें।
’मी-फर्स्ट’ सिंड्रोम: अधीरता का प्रदर्शन
नागरिक बोध का अभाव हमारी दिनचर्या के छोटे व्यवहारों में भी स्पष्ट दिखाई देता है:
विमान शिष्टाचार: विमान के लैंड होते ही, यात्रियों का सीटों से खड़े होकर गलियारे में भीड़ लगाना न तो समय बचाता है और न ही यह गरिमापूर्ण है।
थूकने की कुप्रथा: दीवारों के कोनों और डिवाइडरों को थूक से बदरंग करना हमारे व्यवहार मे रच बस गया है। यह सिर्फ बुरा दिखाई ही नहीं देता बल्कि बीमारियों के फैलने का भी मुख्य कारण है
ध्वनि गरिमा: सार्वजनिक स्थलों या मेट्रो में जोर-जोर से चिल्लाकर बात करना एक साधारण सी बात है लेकिन यह दूसरों की निजता और शांति में खलल डालता है।
आत्म-चिंतन की आवश्यकता
आज हमें स्वयं से कुछ कठिन प्रश्न पूछने होंगे:
◾ क्या हम केवल आपातकालीन स्थिति में ही हॉर्न बजाते हैं?
◾ क्या हम कचरा तब तक पास रखते हैं जब तक कूड़ेदान न मिल जाए?
◾ क्या हम अपनी बारी का धैर्यपूर्वक इंतजार करना जानते हैं?
निष्कर्ष: बदलाव की राह
कोई भी सरकार या कानून हमें तब तक सभ्य नहीं बना सकता, जब तक हम खुद बदलाव न चाहें। नागरिक बोध का अर्थ है—’सही काम करना, तब भी जब कोई देख न रहा हो’। यह अहसास कि “मेरी सुविधा किसी और की दुविधा नहीं बननी चाहिए”, ही एक बेहतर समाज की नींव है। शहर केवल कंक्रीट की इमारतों से नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों के आचरण से पहचाने जाते हैं। समय आ गया है कि हम अपनी व्यस्तता और स्वार्थ से ऊपर उठकर एक उत्तरदायी नागरिक बनें।
सभ्य नागरिक के 5 सुनहरे नियम
◾धैर्य रखें: ट्रैफिक सिग्नल पर हॉर्न का प्रयोग केवल आपात स्थिति में करें। मौन रहकर भी मंजिल तक पहुँचा जा सकता है।
◾कचरा संभालें: यदि कूड़ेदान पास न हो, तो अपना कचरा (रैपर/बोतल) जेब या बैग में रखें। सड़क को अपना घर समझें।
◾निजता का सम्मान: सार्वजनिक स्थानों पर फोन पर या आपस में इतनी जोर से बात न करें कि दूसरों की शांति भंग हो।
◾अनुशासन का परिचय: मेट्रो, बस या हवाई जहाज से उतरते समय धक्का-मुक्की न करें। अपनी बारी की प्रतीक्षा करना ही सभ्यता है।
◾स्वच्छता और स्वास्थ्य: सार्वजनिक स्थलों पर थूकने से बचें। शहर की सुंदरता और स्वास्थ्य को बनाए रखना हमारी साझी जिम्मेदारी है।
